हनुमान बेनीवाल की ‘नेता-चोरी’:नरेश मीणा के ‘दिव्य रथ’ से जाम, मचा ‘त्राहिमाम’; वोट के बदले ‘फेरे’ का वादा

नमस्कार, कांग्रेस वोट चोरी के मुद्दे में उलझी रही और उधर हनुमान बेनीवाल जी नेता चोरी करके ले गए। अब इस पर इंचार्ज और परमानेंट इंचार्ज हंसें न तो क्या करें? दिव्य रथ पर विराजमान होकर राजधानी कूच कर रहे नेताजी ने जाम लगवा दिया और पंचायत चुनाव से पहले सुनिए लोक-लुभावन वादा। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. वोट चोरी के बीच हो गई ‘नेता की चोरी’ कांग्रेस काला दिवस मना रही है। उनके संविधान की पुस्तक रखने वाले नेताजी को पुलिस ने घसीट दिया। वे वोट चोरी का आरोप लगाकर चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांग रहे हैं। बड़े नेता का घसीटा जाना वाकई इतनी बड़ी घटना है कि आंदोलन को जितना चाहे घसीटा जा सकता है। तो आंदोलन को घसीटने के लिए दिग्गज नेता सड़क पर उतर रहे हैं। सभी सहयोगी दलों का समर्थन मिल रहा है। आंदोलन में आध्यात्मिकता का तड़का लगाने के लिए दशहरे से पहले ही पुतला तैयार कर लिया गया। उस पर अग्निबाण चला दिया गया। प्रशासन आंदोलन पर पानी फेरने के लिए पहले की तरह तैयार था, जलता पुतला बुझा दिया गया। हालांकि वह जलकर खुद ही राख हो गया था। दिग्गज नेताओं ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए चेतावनी दी, बोले- गुंडागर्दी नहीं चलेगी, दादागिरी नहीं चलेगी, आज तो काला दिवस मनाया है, कल देखना क्या होता है? अब लग रहा है कि वोट चोरी को लेकर पार्टी भयंकर सीरियस हो चुकी है और अमुक आयुक्त इस्तीफा दें या न दें, विपक्षी खेमा जोर-आजमाइश के आधार पर तय कर ही लेगा कि प्रधानमंत्री पद के लिए ज्यादा पोटेंशियल किस नेता में है। वैसे कांग्रेस के दिग्गज वोट चोरी में उलझे रहे और उधर नागौर वाले सांसद महोदय नेता चोरी करके ले गए। नेता भी कांग्रेस का। वह नेता जो 28 साल से जालोर के रानीवाड़ा में पार्टी का झंडा उठाए हुए था। कांग्रेस के समर्पित नेता पारसराम ढाका ने हाथ निशान का साथ छोड़कर बोतल पार्टी जॉइन कर ली। वोटों का तो नहीं पता, कांग्रेस को अपने नेता बचाकर रखने चाहिए। 2. दिव्य रथ, जाम और त्राहिमाम.. कांग्रेस पार्टी सड़कों पर उतर कर दिन काले कर रही है। बड़े नेता एक टेबल पर बैठकर खाना खा रहे हैं। दूरियों की अटकलें दरारों में समा गई हैं। एकजुटता का नगाड़ा गूंज रहा है। हंसी-ठिठोली हो रही है। ऐसे कांग्रेसमय माहौल में बाड़मेर के युवा विधायकजी सरलीकरण की ध्वजा लेकर काफी भीड़ खींच रहे हैं। हुंकार भर रहे हैं। जुझारूपन दिखा रहे हैं। ललकार रहे हैं। शक्ति प्रदर्शन का दौर चल रहा है। इधर, भूख हड़ताल को साथ लेकर बारां से थप्पड़ वाले नेताजी दिव्य रथ पर विराजमान होकर राजधानी की तरफ बढ़े। रथ ईको फ्रेंडली है। यह न पेट्रोल से चलता है न बैटरी से। न ही हवा, बिजली, सूर्यकिरणों से। यह रेहड़ी नामक दिव्य रथ जनसहयोग से चल रहा है। इसकी गति काफी तीव्र है। कूच के दौरान रेहड़ी रथ पर गद्दे डालकर नेताजी कभी मोबाइल देखते हुए आगे बढ़ते हैं। कभी वे कार की छत पर खड़े होकर दिशा निर्धारत तय करते हैं और कभी वाहन के अंदर इत्मीनान करते हुए राजधानी की तरफ बढ़ रहे हैं। वे जहां से गुजर रहे हैं वहां चिर-परिचित अंदाज में अपने ही समर्थकों पर धौल जमा देते हैं। धौल खाकर भी समर्थक आशीर्वाद सा महसूस करते हैं। जहां ठहरते हैं वहां सांस्कृतिक वातावरण पैदा हो जाता है। गाड़ी की छत पर चढ़कर लोकगायन पेश करते हैं। गायन में भी राजनीतिक चेतावनी है। गायक कहता है- ऐ मेरे शेर, बस तू ऑर्डर कर दे, फिर हम जानें और पुलिस जाने। इसी भावना के साथ काफिला जयपुर की सीमा में पहुंचा तो ‘खाद’ के लए किए जा रहे अश्वमेघ यज्ञ के रथ को रोक दिया गया। रथ रुका तो सैंकड़ों वाहन रुक गए। जाम लग गया। फंसे हुए आम मोबाइल उपभोक्ताओं ने वीडियो सुविधा का उपयोग करते हुए त्राहिमाम करने वाले दृश्य ‘अंतरजाल’ पर डाल दिए। एसडीएम साहिबा और एसडीएम साहब ने मौके पर पहुंचकर हाथ जोड़े दिए। पलटकर नेताजी ने हाथ जोड़कर दो मांगें बता दीं। मांगें सीधी सरल थीं। फिर भी उन्हें हल करने में ढाई घंटे लगे और ‘सहमति’ नामक समाधान निकलने के बाद कारवां को हरी झंडी दिखा दी गई। 3. चलते-चलते… 1992 में दिल का क्या कसूर नामक चित्रपट में मदन पाल नामक गीतकार ने एक नगमा लिखा था। उन्होंने लिखा- मिलने की तुम कोशिश करना वादा कभी न करना, वादा तो टूट जाता है। संभवत: गीतकार को कविवर सोहनलाल द्विवेदी की उन पंक्तियों पर भरपूर भरोसा था, जिसमें उन्होंने कहा था-लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। बहरहाल, पंचायत चुनाव से पहले झुंझुनूं की एक सोशल मीडिया कंटेट क्रिएटर ने अनोखा वादा कर दिया। मैडम सरपंच का चुनाव लड़ने की इच्छुक हैं। दावा किया है कि अगर मुझे वोट देकर जिता दिया तो मैं एक महीने के अंदर कुंआरे लड़कों की शादी करा दूंगी। उसके लिए कुछ भी करना पड़े। तुम्हारी बहन तुम्हारे साथ द्वार-द्वार जाएगी। इस वादे के पीछे एक लॉजिक यह हो सकता है कि झुंझुनूं में कुंआरे वोटर्स की तादाद इतनी ज्यादा है कि उनके वोट के दम पर गांव में कोई भी व्यक्ति सरपंच बन सकता है। वादे के असर का एनालिसिस करें तो हो सकता है कि शादीशुदा वोटर पर इसका विपरीत असर हो और वे अनदेखी का आरोप लगाकर प्रचार और वोटिंग से दूरी बना लें। बाकी वादा है लोक-लुभावन। इनपुट सहयोग- महेंद्र सैनी, शिवम ठाकुर (जयपुर), पुष्पेंद्र सिंह नाथावत (चाकसू) । वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
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