राजस्थान पुलिस में पेंडिंग केस बढ़ने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई थी। इस पर अब पुलिस में बड़े बदलाव की तैयारी है। पुलिस थानों में अब इन्वेस्टिगेशन, लॉ एंड ऑर्डर (कानून व्यवस्था) और एडमिनिस्ट्रेटिव (प्रशासनिक) की अलग-अलग विंग होगी। पुलिस ने राजस्थान हाईकोर्ट में इसका प्लान पेश किया है। हाईकोर्ट ने लंबे समय तक केस की जांच पूरी नहीं होने, पेंडेंसी बढ़ने को लेकर पुलिस में इन्वेस्टिगेशन और लॉ एंड ऑर्डर की अलग-अलग विंग बनाने का निर्देश दिया था। कोर्ट के सामने आया था कि एक ही पुलिसकर्मी के पास इन्वेस्टिगेशन, वीआईपी ड्यूटी, भीड़ नियंत्रण और कानून व्यवस्था व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है। इससे जांच प्रभावित होती है और मामलों में अनावश्यक देरी होती है। इसकी पालना में पुलिस ने चार राज्यों (केरल, पंजाब, दिल्ली और बिहार) के मॉडल की स्टडी करके प्लान पेश किया। इसमें जांच अधिकारियों को नियमित कानून-व्यवस्था ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा, चुनाव ड्यूटी और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त रखा जाएगा। प्लान के अनुसार- राज्य के 20 चयनित पुलिस थानों में पायलट प्रोजेक्ट लागू किया जाएगा। प्रत्येक थाने में जांच, कानून-व्यवस्था और प्रशासन के लिए अलग-अलग इकाइयां बनाई जाएंगी। पुलिस के प्लान को रिकॉर्ड पर लेते हुए जस्टिस अनूप ढंढ की अदालत ने 21 जुलाई को मामले की अगली सुनवाई तय की है। एक जांच अधिकारी के पास 40 से 70 मामले अदालत में पेश रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। महिलाओं के खिलाफ अपराध और संपत्ति संबंधी कई मामलों में दोष सिद्ध करने की दर केवल 40 से 50 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई है। वहीं साइबर अपराध, आर्थिक अपराध और एनडीपीएस से जुड़े मामलों की जांच अक्सर दो सालों से अधिक समय तक लंबित रहती है। रिपोर्ट के अनुसार- कई शहरी थानों में एक जांच अधिकारी के पास एक समय में 40 से 70 तक सक्रिय मामले होते हैं। इससे जांच की गुणवत्ता प्रभावित होती है और मामलों का निस्तारण लंबित होता जाता है। 935 नए पद की सिफारिश इस नई व्यवस्था को लागू करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता भी सामने आई है। समिति ने पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित थानों में लगभग 935 नए पद सृजित करने की सिफारिश की है। साथ ही साइबर, फोरेंसिक और वित्तीय अपराधों के विशेषज्ञों को अनुबंध के आधार पर नियुक्त करने का सुझाव भी दिया है। 20 साल बाद भी राजस्थान में कोई अमल नहीं हाईकोर्ट ने आदेश में साल 2006 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ फैसले का भी उल्लेख किया। इसमें पुलिस सुधारों के तहत जांच और कानून-व्यवस्था को अलग करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने कहा- दो दशक बीत जाने के बावजूद राजस्थान में इस दिशा में प्रभावी अमल नहीं हुआ। अदालत ने राज्य में आधुनिक जांच प्रयोगशालाओं की कमी पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा- कई मामलों में वैज्ञानिक जांच के लिए अन्य राज्यों पर निर्भरता के कारण देरी होती है। इससे अपराधियों को लाभ मिलता है। कोर्ट ने राज्य में अत्याधुनिक जांच लैब स्थापित करने और तकनीकी संसाधनों को मजबूत करने पर जोर दिया।

