‘तबेले’ में घुसने से पहले ‘कॉकरोचों’ की पिटाई:साइंस टीचर का ‘अलाइनमेंट’ गड़बड़ाया; ट्रांसफर हुआ तो गुरुजी से लिपटे

नमस्कार, जयपुर में ‘कॉकरोच’ दूसरी बार पिट गए। पहले फाउंडर साहब को थप्पड़ पड़ गए थे, अब को-फाउंडर को पीट दिया। अजमेर में साइंस टीचर नशे में स्कूल पहुंच गया, खेल ग्राउंड में उसका ‘अलाइनमेंट’ बिगड़ गया। वहीं चूरू के एक स्कूल से प्रिंसिपल का ट्रांसफर हुआ तो बच्चे लिपटकर रोने लगे। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. स्कूल सेफ नहीं और निरीक्षण भी.. कॉकरोचों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा क्या लिया, अब देशभर के स्कूल सूंघते घूम रहे हैं। आंदोलन का पैटर्न सेट। एजुकेशन के नाम पर पब्लिक और जेन-जी का सपोर्ट ले लो। कॉकरोचों के फाउंडर साहब महाराष्ट्र के स्कूलों में घूम रहे हैं। खामियों पर रीलें बना रहे हैं। छोटे उस्ताद राजस्थान की परिक्रमा कर रहे हैं। टीम के साथ अलवर के एक स्कूल में हल्ला भी बोल आए। इसके बाद छोटे उस्ताद राजधानी के बगरू की तरफ निकले। वहां सरकारी स्कूल जर्जर। भैंसों के तबेले में बच्चे पढ़ रहे। कॉकरोच सेना तबेले की तरफ बढ़ने लगी। स्कूल की हालत ये कि जिस दीवार पर लिखा था- मेरा विद्यालय सुरक्षित विद्यालय, वही दीवार सबसे ज्यादा जर्जर। मौका बढ़िया था। मौसम चुनावी था। निशाना सियासी था। लेकिन.. कॉकरोचों को पता नहीं था कि गांव में ‘फौज’ खड़ी है। फौज ने ऐलान किया कि कॉकरोचों को गांव में नहीं घुसने देंगे। कॉकरोचों ने तय किया कि घुसकर ही मानेंगे। गांव की पगडंडी पर दोनों फौजें आमने-सामने हो गईं। राजनीति का एक उसूल है- जो पिटेगा वही टिकेगा। तो टिकने के लिए कॉकरोच खूब पिटे। जाना था जापान पहुंच गए चीन की तर्ज पर जिन कॉकरोचों को स्कूल जाना था, वे हॉस्पिटल पहुंच गए। राजस्थान में अस्पतालों के हालात भी कहां अच्छे हैं? प्रसूताओं का मामला ताजा है ही। लोगों में चर्चा रही कि कि कहीं टारगेट शिक्षा मंत्री से खिसक कर चिकित्सा मंत्री पर सेट न हो जाए। लेकिन घायल कॉकरोचों ने अव्यवस्थाओं की ओर ध्यान न देकर सिर्फ इलाज कराया। चौपाल पर देर तक यही बात होती रही- अब तो स्कूल ही नहीं, बल्कि स्कूल का निरीक्षण करना भी सुरक्षित नहीं है। 2. साइंस टीचर का ‘अलाइनमेंट’ उनका नाम भीमाराम है। वे अजमेर के केकड़ी इलाके के छोटे से गांव उंदरी के सरकारी स्कूल में साइंस टीचर हैं। पता नहीं उनकी खुशकिस्मती है या बदकिस्मती। वे 27 साल से इसी स्कूल में हैं। चूंकि उन्हें ट्रांसफर का डर नहीं, इसलिए वे नशा करके भी स्कूल आ सकते हैं। उस दिन भीमाराम जी की डोज कुछ हेवी हो गई। स्कूल का खेल मैदान पार करते वक्त उनका अलाइनमेंट बिगड़ गया। वे मैदान में चादर की तरह बिछ गए। दिमाग ने भीमाराम जी को ललकारा- अरे मूर्ख, शर्म कर, तू शिक्षक है। शिक्षक बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाता है। तू खुद मिट्‌टी सूंघ रहा है। दिमाग की बात सुन भीमाराम ने आत्मनिर्भर होने की भरसक कोशिश की। लेकिन शरीर ने इस्तीफा दे दिया। गांव वाले भी स्कूल में पहुंच गए। मास्टरजी की हालत पर किसी को हंसी आई, किसी को तरस और किसी को गुस्सा। सबने मिलकर संबल अभियान चलाया और मास्टरजी को लगभग घसीटते हुए चौरस स्थल पर ले आए। कोई पानी की कैन ले आया। चूंकि सावन का महीना चल रहा है। इसलिए एक बुजुर्ग ने गुरुजी का जलाभिषेक कर डाला। बच्चों को नशे की बुराई का इससे बढ़िया पाठ कोई गुरु ही पढ़ा सकता है। बच्चों ने सोचा होगा- मास्टर जी की जो दशा है, उसका कारण नशा है। 3. चलते-चलते.. मशहूर शायर निदा फाजली साहब ने लिखा था- बच्चों के छोटे हाथों को चांद-सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे। जो पाठ जिंदगी सिखा सकती है, वो किताबें नहीं सिखा सकतीं। कई दिनों से हो हल्ला मचा है। बच्चे सरकारी स्कूल में अच्छी सुविधाओं के लिए आंदोलन कर रहे हैं। कहीं टीचर नहीं, कहीं टपकती छत, कहीं टॉयलेट खराब। कहीं झोंपड़े में स्कूल है तो कहीं तबेले में। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में कमियां तो मिलेंगी। हम कमियों का रोना रोएंगे तो रोते ही रहेंगे। क्योंकि कमियां कभी पूरी तरह दूर नहीं की जा सकती। ऐसे-ऐसे प्राइवेट स्कूल भी हैं, जहां किसी सुविधा की कोई कमी नहीं। लग्जरी होटल जैसा स्कूल। लेकिन वहां भी बुलिंग से परेशान होकर बच्ची ने छलांग लगा दी। सरकारी स्कूल के बच्चे बुलिंग नहीं समझते। वे पिटाई खाकर भी मस्ती करते हैं। वे खुद को किसी रेस में शामिल नहीं करते। वे खुलकर जीते हैं। जिंदगी का पाठ पढ़ते हैं। कभी-कभी कुछ टीचर बच्चों को जिंदगी का पाठ पढ़ा देते हैं। चूरू के बैरासर स्कूल के प्रिंसिपल सुभाष मेघवाल का ट्रांसफर हो गया। स्कूल की ओर से विदाई समारोह रखा गया। प्रिंसिपल साहब जब जाने लगे तो बच्चों ने उन्हें घेर लिया। लिपट कर रोने लगे। प्रिंसिपल भी अपने आंसू नहीं रोक सके। माहौल दुख और करुणा से भर गया। प्रिंसिपल साहब ने स्कूल के बच्चों को अपने बच्चों की तरह मानकर उन्हें शिक्षा दी। बस, इसी में स्कूल की जीत है, टीचर की जीत है, बच्चों की जीत है। बाकी, जहां तक कमियों की बात है तो निदा फाजली साहब का ही एक और शेर है- कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता। इनपुट सहयोग- स्मित पालीवाल, रिषभ सैनी (जयपुर), भरत मूलचंदानी (अजमेर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
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