नमस्कार चूरू के सादुलपुर कोर्ट में एसडीएम साहब को एक व्यक्ति ने बेशर्म आदमी कह दिया। हेल्थ मिनिस्टर के प्रसूता वाले बयान के बाद कांग्रेस ने बीकानेर में अनोखा सफाई अभियान चलाया। सीकर में गुढ़ाजी ने राठौड़ साहब की दुखती रग पर हाथ धर दिया और जयपुर में खाकी ने खाकी से खाकी की शिकायत कर दी। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. SDM को कहा बेशर्म आदमी सुनवाई नहीं होने का ये मतलब नहीं कि ऊंचे ओहदे पर बैठे अधिकारी को ‘बेशर्म’ कह दो। तरीका होता है। प्रार्थना पत्र दो। सुनवाई न हो तो दूसरा-तीसरा दो। धीरज धरो। सरकारी सिस्टम में समय पर काम हो जाए इसकी गारंटी भले न नहीं ली जा सके। लेकिन आगंतुक सब्र सीख जाता है ये पक्की बात। नीली टीशर्ट-शिकारी वाली टोपी लगाए अधेड़ से अधिक उम्र वाले सज्जन चलती सभा में पहुंचे। गलियारे में खड़े होकर जोर से चिल्लाए- ‘बेशर्म आदमी’ इस पर एसडीएम साहब और उनके इर्द-गिर्द जमा लोग तमतमा गए। SDM साहब बाहर आए, बोले-पकड़ लो। जाने मत दो। गार्ड को बुलाओ। बंद कराओ। भड़कना वाजिब था। काम, काम की तरह होता है। ऊंचा-नीचा बोलने से थोड़े हो जाएगा। यही मुद्दा बाद में पंचायत समिति में उठा। बैठक में विधायकजी आए हुए थे। उन्होंने टोपीवाले आदमी का समर्थन किया। SDM से बोले- गाली मत देखो। बात की गहराई में जाओ। जनता ने बात रखी थी। अपने हक के लिए बात रखना जायज है। फिर बिगड़कर बात आगे बढ़ाई- और ये कैसे कह दिया कि बंद करो इसको? तुम बंद करा सकते हो क्या? 2. जुबान की सफाई बीकानेर में चिकित्सा मंत्रीजी ने प्रसूताओं के ‘नाचते हुए आने’ की कलात्मक कल्पना की। यह बताने के लिए कि लोग बीमार होकर हॉस्पिटल आते हैं और हॉस्पिटल के माथे हो जाते हैं। हालांकि इस पर पत्रकारों ने वहीं इलाज करते हुए इस सोच पर सवाल उठा दिया। उधर, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मामले को माताओं-बहनों के अपमान से जोड़ दिया। वे सड़कों पर उतरे और मिनिस्टर साहब की जीभ को ‘गंदी जुबान’ करार दे दिया। इसके बाद गंदी जुबान सफाई अभियान चला। मंत्रीजी का पुतला बनाकर जीभ लगाई गई। जीभ गंदी कम और लंबी ज्यादा थी। इसके बाद क्लीनर से जीभ की सफाई होने लगी। चलो जुबान साफ हुई अच्छा हुआ। बाकी विरोध का जो क्लासिक तरीका अपनाया गया, इससे लगता है कि कुछ कॉकरोच कांग्रेस में भी घुसे हुए हैं। 3. कौन बैठा रह गया उकड़ू? जातियों की जनगणना पर राजनेता क्यों जोर देते हैं? ताकि फरियादी और अफसर के झगड़े में जाति का एंगल निकाल सकें। दो गुटों में लाठी बजें तो मरहम पट्टी जातिवादी तरीके से कर सकें। ताकि फिंगर टिप पर यह ध्यान रख सकें कि अमुक जाति का वोटबैंक कितना है। गुढ़ाजी आरक्षण के मुद्दे पर बोल रहे थे। सीकर में सभा चल रही थी। अचानक वे एक कस्बे का नाम बदलने के राजनीतिक मुद्दे की तरफ मुड़ गए। जिसका आरक्षण से कोई संबंध नहीं था, लेकिन जाति से था। उन्होंने अपने-आप को उनका वंशज बताया, जिन्होंने पता नहीं कितनी उम्र में पता नहीं कितनी लड़ाइयां लड़ीं। हर लड़ाई में उनके दाहिने ‘वोटबैंक’ के पुरखे हुआ करते थे। इसलिए अब उनका दायित्व है कि वे उनके हकों की रक्षा करें। ऐसा करने के लिए पैदल चलकर सड़क पर बेहोश होना पड़े तो भी वे तैयार हैं। हालांकि इस बीच उन्होंने ‘भाटे भिड़ाने’ के मकसद से कहा- राजेंद्र राठौड़ 7 बार विधायक, 4 बार मंत्री रहे। लेकिन उकड़ू बैठे रह गए और सतीश पूनिया राज्यसभा निकल गए। उन्होंने जनता से पूछा- क्यों? फिर खुद जवाब लीक करते हुए कहा- क्योंकि ऐसा नहीं करते तो अमुक जाति के लोग फलां काम कर देते। कल को पार्टी राठौड़ साहब को किसी बड़े पद पर बैठा दे तो कोई न कोई नेता कहेगा- पूनियाजी को राज्यसभा देकर टरका दिया और इन्हें बड़े पद पर बैठा दिया। क्योंकि ऐसा नहीं करते तो अमुक जाति.. 4. चलते-चलते.. अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र के लिए लोकप्रिय उक्ति कही थी- वह शासन जो जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा हो। इसी उक्ति से मिलते-जुलते नियम के अनुसार जयपुर में खाकी ने खाकी से खाकी की शिकायत कर दी। हुआ यूं कि कमिश्नर साहब जन-सुनवाई कर रहे थे। इसमें RAC का एक जवान अपने परिवार के साथ पहुंच गया। साहब से शिकायत करते हुए कहा- वह जो कॉन्स्टेबल है न फलां थाने का, उसने हमें रातभर पीटा साहेब। उम्मीद है कि साहब खाकी के न्याय के लिए खाकी के खिलाफ खाकी की स्टाइल में कार्रवाई करेंगे। इनपुट सहयोग- अनुराग हर्ष (बीकानेर), सुरेंद्र माथुर (सीकर), नरेश भाटी (चूरू), कृष्ण फगेड़िया (सादुलपुर, चूरू)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

