नमस्कार डीग में मूर्ति की मांग करने वाली लड़की को लेकर विधायक मैडम ने खूब दरियादिली दिखाई। झुंझुनूं में कलेक्टर साहब के सफाई अभियान की फोटो के लिए कचरा जुटाया गया। AI क्रिएटर्स ने साझे में पायलट-बेनीवाल और किरोड़ी बाबा का टी-स्टॉल खुलवा दिया और चित्तौड़गढ़ के डांसिंग अंपायर का क्या कहना। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. मूर्ति मांगी तो MLA ने दिया ‘फुल पैकेज’ विधायक नौक्षम चौधरी डीग जिले के एक गांव में जन-संवाद कर रही थीं। इस दौरान एक लड़की रोती-बिलखती वहां पहुंची। हाथ में माला। विधायक ने पूछा- क्या बात है? बोली- मेरे गांव में बाबा साहब की मूर्ति लगवा दो। इतनी सी बात थी। विधायक ने लड़की के बारे में पता किया। जानकारी मिली कि बहुत ही गरीब परिवार से है। विधायक मैडम का दिल भर आया। लड़की से उसके पिता का फोन नंबर लिया और कॉल किया। कहा- आपकी बेटी की आगे की पढ़ाई, खाने-पीने, रहने का सारा खर्च मेरे जिम्मे। चाहे विदेश में पढ़ाओ, आप पैसे की चिंता नहीं करना। इसकी शादी का सारा खर्चा भी मैं ही उठाऊंगी। जन-संवाद कार्यक्रम में तालियां गूंजने लगीं। नारेबाजी होने लगी। विधायक ने लड़की को नसीहत दी- मूर्ति तो लग ही जाएगी। हमेशा बाबा साहब के नक्शे कदम पर चलना। 2. ‘कचरा अभियान’ और ‘सफाई’ केस 1: सफाई जरूरी है। लेकिन सफाई अगर माननीय नेता और आदरणीय प्रशासक करें तो फोटो खिंचना बहुत जरूरी। फोटो होगी तभी तो माननीयों-आदरणीयों की मेहनत का पता चलेगा। तो सफाई अभियान की सफलता इसी में है कि सफाई करते हुए फोटो खिंचवाई जाए। बिलावड़ी जोहड़ झुंझुनूं जिले के चिड़ावा कस्बे के श्योपुरा-भौमपुरा गांव का छोटा सा तालाब है। तालाब की तकदीर उस वक्त खुल गई जब पता चला कि कलेक्टर साहब वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान के तहत यहां श्रमदान करेंगे। कलेक्टर साहब पहुंचे। श्रमिक पहले से सफाई में लगे थे। कलेक्टर साहब की श्रमदान करते फोटो खींची जानी थी। लिहाजा कचरे से भरी टोकरी मंगवाई गई। कचरे को जमीन पर डाला गया। इसके बाद परातों में भरा गया। परात उठाकर साहब की तरफ बढ़ाई गई। रस्मी तौर पर सभी ने टोकरी को छूते हुए फोटो खिंचाई। टोकरी मानव श्रृंखला के जरिए तालाब से बाहर पहुंचाई गई। एक उत्साही सज्जन ने तो टोकरी सिर से उतारी ही नहीं। उन्हें फोटो मिस होने का डर रहा। केस 2: कांग्रेस के जिलाध्यक्षों ने चिंतन शिविर का 8वां दिन श्रमदान के लिए तय किया। इसके लिए किशनगढ़ (अजमेर) की श्रीनगर पंचायत समिति क्षेत्र का फारकिया गांव चुना गया। चिंतन शिविर में राजस्थान और दिल्ली के कांग्रेस जिलाध्यक्ष शामिल थे। साइट पर चूना बिखेरकर नक्शा बनाया गया। नक्शे की पैमाइश के मुताबिक जिलाध्यक्षों की टीमें बनी। ऐसा श्रमदान हुआ कि नेतागण पसीने में तर-बतर हो गए। श्रमिक महिलाएं मंगलगीत गाने लगीं। विधायक विकास चौधरी श्रमदान पर जोश ऐसा कि न धूप का असर और न गर्म हवा का। जूते के फीते कसकर खूब जोर लगाया। श्रमिक भी टुकुर-टुकुर देखने लगे कि हो क्या रहा है? कहीं श्रम के साथ पारिश्रमिक तो नहीं छिन जाएगा? हालांकि नेतागण का पारिश्रमिक रुपया-पैसा नहीं। श्रमदान के बाद श्रमिक महिलाओं के बीच बैठकर फोटोग्राफर ने ‘किसिक’ करके जो फोटो खींची, वही मेहनताना। 3. ‘पायलट-बेनीवाल’ का टी-स्टॉल पेट्रोल-डीजल बचाने की तरकीबें की जा रही हैं। पैदल चलने की होड़ लगी है। यह भी सिखाया जा रहा है कि बिना तेल में सब्जी कैसे बनाई जाए। इस बीच एक लीटर पानी से कैसे नहाया जाए, इसकी ट्रेनिंग दी जा रही है। डर है कि कहीं छोटी-मोटी चीजें भी आमजन की पहुंच से बाहर न निकल जाएं। कल्पना कीजिए कि चाय की स्टॉल का लाइसेंस भी माइंस की तरह मिले। तब नेताओं के ही टी-स्टॉल होंगे। एक AI क्रिएटर ने इस कल्पना को साकार कर वीडियो बना दिया। एआई जनरेटेड यह दिलचस्प वीडियो है। टी-स्टॉल पायलट और बेनीवाल का है। लेकिन समस्या यह कि हनुमान बेनीवाल को गैस सिलेंडर नहीं मिला। उन्हें धंधे में घाटे का डर सता रहा है।
चाय महंगी करने का विचार है, लेकिन ग्राहक कम होने का डर भी सताता है। पायलट सुझाव देते हैं कि गैस चाहिए तो किरोड़ी बाबा को दुकान में पार्टनर बनाना पड़ेगा। किरोड़ी बाबा सीधे होर्मुज स्टेट से जहाज पार करवा के गैस ले आएंगे। इधर, तीसरे साझेदार किरोड़ी बाबा कहते हैं- सिलेंडर दिलवा दूंगा, लेकिन गरीब को फ्री में चाय पिलानी पड़ेगी। 4. चलते-चलते.. क्रिकेट रोमांच का खेल है। बल्लेबाजी का रोमांच। गेंदबाजी का रोमांच और दर्शकों का रोमांच। लेकिन अंपायरिंग में क्या रोमांच। वो तो बेचारा फील्ड पर खड़ा रहता है और आउट, वाइड, चौका, छक्का होने पर इशारा करता है। न्यूजीलैंड के एक मशहूर अंपायर थे। नाम था बिली बोडेन। उन्हें डांसिंग अंपायर कहा जाता था। चौका-छक्का होने पर उनके इशारे लगभग नृत्य शैली के होते थे। बल्लेबाज को वे आउट भी टेढ़ी अंगुली से देते थे। कहा जाता है कि खड़े-खड़े उन्हें मसल्स पेन होता था। इसे दूर करने के लिए उन्होंने अंपायरिंग में ये प्रयोग किए और यही उनकी कामयाबी का राज। काफी मशहूर हो गए। इधर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में भी डांसिंग अंपायर हैं जानू राजस्थानी। अपने अंदाज के कारण लोकल क्रिकेट में इनकी भारी डिमांड रहती है। आस-पास के राज्यों में भी अंपायरिंग करने जाते हैं। जब पता चलता है कि जानू अंपायरिंग करने आ रहे हैं तो युवाओं की भीड़ जुट जाती है। चौका-छक्का लगने या आउट होने पर वे ऐसा डांस करते हैं कि क्रिकेट के रोमांच पर उनके डांस का रोमांच कभी-कभी भारी पड़ जाता है। खरी बात ये कि एक जैसा काम कई लोग करते हैं। लेकिन उस काम को आप किस तरीके से कर रहे हैं, यही आपकी पहचान स्थापित करता है। इनपुट सहयोग- मुकेश जांगिड़ (डीग), चंद्रमौली पचरंगिया (चिड़ावा, झुंझुनूं), रोहित पारीक (किशनगढ़, अजमेर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
चाय महंगी करने का विचार है, लेकिन ग्राहक कम होने का डर भी सताता है। पायलट सुझाव देते हैं कि गैस चाहिए तो किरोड़ी बाबा को दुकान में पार्टनर बनाना पड़ेगा। किरोड़ी बाबा सीधे होर्मुज स्टेट से जहाज पार करवा के गैस ले आएंगे। इधर, तीसरे साझेदार किरोड़ी बाबा कहते हैं- सिलेंडर दिलवा दूंगा, लेकिन गरीब को फ्री में चाय पिलानी पड़ेगी। 4. चलते-चलते.. क्रिकेट रोमांच का खेल है। बल्लेबाजी का रोमांच। गेंदबाजी का रोमांच और दर्शकों का रोमांच। लेकिन अंपायरिंग में क्या रोमांच। वो तो बेचारा फील्ड पर खड़ा रहता है और आउट, वाइड, चौका, छक्का होने पर इशारा करता है। न्यूजीलैंड के एक मशहूर अंपायर थे। नाम था बिली बोडेन। उन्हें डांसिंग अंपायर कहा जाता था। चौका-छक्का होने पर उनके इशारे लगभग नृत्य शैली के होते थे। बल्लेबाज को वे आउट भी टेढ़ी अंगुली से देते थे। कहा जाता है कि खड़े-खड़े उन्हें मसल्स पेन होता था। इसे दूर करने के लिए उन्होंने अंपायरिंग में ये प्रयोग किए और यही उनकी कामयाबी का राज। काफी मशहूर हो गए। इधर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में भी डांसिंग अंपायर हैं जानू राजस्थानी। अपने अंदाज के कारण लोकल क्रिकेट में इनकी भारी डिमांड रहती है। आस-पास के राज्यों में भी अंपायरिंग करने जाते हैं। जब पता चलता है कि जानू अंपायरिंग करने आ रहे हैं तो युवाओं की भीड़ जुट जाती है। चौका-छक्का लगने या आउट होने पर वे ऐसा डांस करते हैं कि क्रिकेट के रोमांच पर उनके डांस का रोमांच कभी-कभी भारी पड़ जाता है। खरी बात ये कि एक जैसा काम कई लोग करते हैं। लेकिन उस काम को आप किस तरीके से कर रहे हैं, यही आपकी पहचान स्थापित करता है। इनपुट सहयोग- मुकेश जांगिड़ (डीग), चंद्रमौली पचरंगिया (चिड़ावा, झुंझुनूं), रोहित पारीक (किशनगढ़, अजमेर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

