20 साल का ट्रेंड:निगमों पर 62.5 फीसदी बीजेपी, कांग्रेस का 32.5 फीसदी राज रहा

जिस पार्टी की सरकार उसी के स्थानीय निकायों में बोर्ड बनाने की सफलता दर 70 से 75 प्रतिशत तक रही प्रदेश के निकाय चुनावों के इतिहास का बड़ा गणित यह है कि राज्य में जिस पार्टी की सरकार होती है, उसकी स्थानीय निकायों में बोर्ड बनाने की सफलता दर 75% तक पहुंची है। बीजेपी बोर्ड बनाने में हमेशा आगे रही है। पिछले 20 वर्षों में बीजेपी का शहरों की सरकारों पर राज करने का प्रतिशत 62.5 रहा है। कांग्रेस का आंकड़ा 32.5 रहा है। शहर बीजेपी के गढ़ रहे हैं। हालांकि कांग्रेस ने यह सफलता हासिल करने के लिए काफी मशक्कत की है। जयपुर, जोधपुर और कोटा में दो-दो नगर निगम पिछली सरकार में बने थे, जो इस सरकार में खत्म हो गए हैं। इससे पूर्व 2009 में सीधे मेयर के चुनाव जनता से कराने का फार्मूला भी लाए थे, जिसे बाद में बीजेपी सरकार ने खत्म किया था। गौरतलब है कि अब प्रदेश में 10 नगर निगम हैं और इन्हीं के परिणामों पर सभी की नजर टिकी है। जयपुर में सर्वाधिक 24 लाख से अधिक वोटर चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं। जयपुर की स्थिति: यहां पिछले 20 साल से अधिकांश समय भाजपा का वर्चस्व रहा जयपुर: 2009 के सीधे चुनावों में यहां कांग्रेस की ज्योति खंडेलवाल मेयर बनी थीं, लेकिन पार्षदों का बहुमत (बोर्ड) भाजपा का ही था। 2014 में फिर भाजपा का पूर्ण बोर्ड बना। 2020 में इसे दो भागों में बांटा गया—जयपुर ग्रेटर में भाजपा का और जयपुर हेरिटेज में कांग्रेस का बोर्ड बना था। वर्तमान में (2024-2025 के बाद से पुनः विलय के बाद) यहां भाजपा का नियंत्रण है। जोधपुर: यहां पिछले 20 साल में भाजपा और कांग्रेस दोनों के बीच बारी-बारी से सत्ता बदलती रही है। इतिहास: 2009 में यहां कांग्रेस का मेयर बना। 2014 के चुनावों में पासा पलटा और भाजपा ने अपना बोर्ड बनाया। इसके बाद 2020 में नगर निगम दो हिस्सों में विभाजित हुआ, जिसमें जोधपुर उत्तर में कांग्रेस और जोधपुर दक्षिण में भाजपा ने अपना-अपना बोर्ड स्थापित किया। कोटा: कोटा नगर निगम में भी पिछले दो दशकों में भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला रहा है। वर्ष 2009 के निकाय चुनावों में यहां कांग्रेस का स्पष्ट बोर्ड बना था और रत्ना जैन मेयर चुनी गईं। 2014 में भाजपा ने भारी बहुमत से वापसी करते हुए एकतरफा बोर्ड बनाया। 2020 के विभाजन के बाद कोटा उत्तर में कांग्रेस का स्पष्ट बोर्ड बना, जबकि कोटा दक्षिण में कांग्रेस ने निर्दलीयों के सहयोग से अपना बोर्ड बनाया था। 2025 में भजनलाल सरकार ने इन दोनों निगमों को दोबारा एक कर दिया है। अजमेर: अजमेर नगर निगम पर पिछले 20 साल से लगातार भाजपा का एकछत्र राज रहा है। इतिहास: यहां 1990 के बाद से लगातार भाजपा का ही बोर्ड बनता आ रहा है। बीच में केवल 2010 के सीधे चुनाव के दौरान मेयर का पद कांग्रेस के कमल बाकोलिया ने जीता था, लेकिन निगम के भीतर पार्षदों का बहुमत और मुख्य बोर्ड भाजपा का ही था। उदयपुर: नगर निगम (2013 से पहले नगर परिषद) में पिछले 20 साल से पूर्ण रूप से भाजपा का कब्जा है। यहां कांग्रेस एक बार भी अपना बोर्ड नहीं बना पाई है। बीकानेर: पिछले 20 वर्षों में भाजपा का पलड़ा भारी रहा है। 2009 के चुनाव में यहां कांग्रेस के भवानी शंकर शर्मा मेयर बने और कांग्रेस का बोर्ड रहा। इसके बाद 2014 के चुनावों और फिर 2019 के निगम चुनावों में भाजपा ने लगातार शानदार जीत दर्ज कर अपना बोर्ड बनाया और वर्तमान तक यहां भाजपा की सुशीला कंवर मेयर हैं। भरतपुर: साल 2014 में निगम का दर्जा मिला था। यहां 20 वर्षों में त्रिशंकु और मिली-जुली सरकारों (भाजपा/कांग्रेस/निर्दलीय) का प्रभाव रहा है। 2014 के चुनाव में भाजपा ने निर्दलीयों के साथ मिलकर पहली मेयर (सुमन कोली) बनाई। इसके बाद 2019 में कांग्रेस के सहयोग से निर्दलीय अभिजीत कुमार मेयर बने। भीलवाड़ा: भीलवाड़ा शहर लंबे समय तक नगर परिषद था और इसे सितंबर 2024 में ही भजनलाल सरकार द्वारा नगर निगम बनाया गया है। यदि पिछले 20 साल के इतिहास (नगर परिषद के तौर पर) को देखें, तो यह शहर संघ और भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है। अलवर: अलवर को अगस्त 2023 में निगम घोषित किया गया था। नगर परिषद के रूप में पिछले 20 सालों के इतिहास में यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों का बारी-बारी से शासन रहा है। यहां का स्थानीय बोर्ड हमेशा राज्य में सत्ताधारी पार्टी के समीकरणों या निर्दलीयों के जोड़-तोड़ से तय होता रहा है।
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