नमस्कार, श्रीगंगानगर वाले विधायक जी का गुस्सा मशहूर होता जा रहा है। इस बार फूलों की बात पर आपे से बाहर हो गए। बाड़मेर वाले युवा विधायक ने लेदर की बॉल का सामना किया तो बच्चों की फिक्र हुई। जयपुर में म्यूजियम के बाहर पुलिस की ‘धरोहर’ को क्रेन से उठाना पड़ा और चलते-चलते मिलिए पत्तावादक महाशय से। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. विधायक साहब को आया ‘उबाल’ दुष्यंत कुमार जी की मशहूर गजल की पंक्ति है- हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए। श्रीगंगानगर वाले विधायक जी सीने में आग लेकर घूमते हैं। उनका गुस्सा पॉपुलर होता जा रहा है। तीन-चार महीने पहले एक AEN ने अपनी चोटें दिखाते हुए कहा था कि विधायक जी को गुस्सा आ गया, उन्होंने मारा। इस बार विधायक जी फूलों की बात पर बिगड़ गए। हालांकि गुस्सा आने में फूलों की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं। हुआ यूं कि नए सभापति और उपसभापति का पदभार ग्रहण कार्यक्रम चल रहा था। विधायक जी ने हंसी-खुशी परिसर में एंट्री ली थी। जनता जनार्दन को नमस्कार करते, लोगों से हाथ मिलाते पहुंचे थे। मंच पर गुरु महाराज के चरणों में झुके। निर्धारित कुर्सी पर बैठे। इस दौरान लोग गुलदस्ता देकर नए सभापति-उप सभापति का स्वागत करने लगे। पुष्पगुच्छ लेकर खत्री समाज के अध्यक्ष भी वहां पहुंचे। वे मंच की ओर बढ़े। लेकिन मंच पर पहले से मजमा लगा था। ऐसे में विधायक ने अध्यक्ष को नीचे ही रोक दिया। अध्यक्ष से भरी सभा में यह बेइज्जती बर्दाश्त नहीं। उन्होंने गुलदस्ता टेबल पर फेंक दिया। बस इसी बात पर विधायक जी भड़क गए और आपे से बाहर हो गए। लोगों ने उन्हें संभाला और समझा-बुझाकर आसन ग्रहण कराया। 2. लेदर बॉल से MLA को हुई ‘फिक्र’ विधायकों में वे निर्दलीय हैं। लेकिन उनका जलवा बड़े-बड़ों से कम नहीं। वे युवाओं के आइकन हैं। अपनी माटी, अपनी भाषा से उन्हें खूब प्रेम है। यही वजह है कि उन्हें देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी समाजों के कार्यक्रमों में शामिल होने के न्योते मिलते हैं। कभी जम्मू का टूर और कभी मध्यप्रदेश के बड़नगर का। लोगों में क्रेज भी रहता है। हाल ही बाड़मेर में एक क्रिकेट टूर्नामेंट के उद्घाटन के लिए विधायक जी को बुलाया गया। रस्म अदायगी के लिए बैट विधायक जी को पकड़ाया गया और बॉलर बॉल करने को तैयार हुआ। विधायक भाटी ने देखा कि बॉलर के हाथ में लेदर की बॉल है। उन्होंने कहा- बच्चों को लेदर बॉल से खिलाओगे? बॉलर ने हामी भरी। विधायक जी को फिक्र हुई। बॉलर ने बॉलिंग की। विधायक ने हल्के से बल्ला घुमाया। बॉल पास खड़े कार्यकर्ता के पैरों पर जाकर लगी। विधायक ने उसका हालचाल पूछा। इसके बाद फिर सवाल दोहराया- बच्चों को लेदर बॉल से खिलाओगे? 3. म्यूजियम के सामने ‘एंटीक पीस’ जयपुर में पुलिस की पेट्रोलिंग वाली गाड़ी चेतक म्यूजियम के सामने धराशायी हो गई। सीपीआर से भी काम नहीं चला। यानी धक्का भी लगाया और बैटरी बदलकर भी स्टार्ट करने की कोशिशें फेल रहीं। बाद में क्रेन बुलाकर गाड़ियों के ‘शफाखाना’ भिजवाया गया। एक तो वह चेतक था जिसने अपने मालिक की आन, बान और शान के लिए नाले के ऊपर से छलांग लगा दी थी। महाराणा को दुश्मनों के हाथों पड़ने न दिया। एक यह चेतक। न जाने क्या सोचकर ऐसे वाहनों को चेतक का नाम दे दिया जिनका समय पर मेंटेनेंस तक नहीं होता। राजधानी की पुलिस के पास तो पेट्रोलिंग के लिए चमाचम गाड़ियां होनी चाहिए। पुलिस के बेड़े की गाड़ियों की हालत गाहे-बगाहे सामने आती है। कहीं खुद खाकीवाले धक्का लगाते दिखते हैं तो कहीं पब्लिक। कुछ दिनों पहले की बात है, अलवर में लुटेरों का पीछा करती पुलिस की गाड़ी रास्ते में टें बोल गई। सीकर में मंत्रीजी के दौरे के बीच पुलिस काफिले की गाड़ी स्टार्ट होने से रह गई, पब्लिक-पुलिस के संयुक्त तत्वावधान में धक्का प्रयास से सफलता मिली। गाड़ियां पुलिस के पैर हैं। पैर ही न चलें तो किसी अपराधी का पीछा खाक किया जाएगा? अल्बर्ट हॉल म्यूजियम में एक से एक एंटीक आइटम हैं, तो इसके बाहर ‘एंटीक पीस’ की क्या जरूरत? 4. चलते-चलते… बाड़मेर-जैसलमेर में गर्मी से हाल बेहाल है। मौसम वैज्ञानिक कहते हैं कि सितंबर के महीने में ऐसी गर्मी कभी नहीं पड़ी। राजस्थान सूखा प्रदेश तो है ही। हमें बारिश की बहुत जरूरत होती है। पश्चिम राजस्थान के किसान खरीफ की फसल को लेकर परेशान हैं। मीलों तक फैला रेगिस्तान हमारा हिस्सा है। सूखा-शुष्क और गर्म इलाका। जहां बूंद-बूंद पानी का महत्व है। मौसम से मार और धरती मैया से थार पाने के बावजूद यहां के कण-कण में कला है। चित्तौड़गढ़ की भदेसर तहसील का छोटा सा गांव है आसावरा। गांव का नाम आवरी माता के नाम पर है। इसी गांव के शंभूलाल जंगल में बकरियां चराते थे। जंगल के ताल के बहुत पेड़ थे। ताल के पत्तों से तब पत्तल दोने बनते थे। दोपहरी काटने के लिए शंभूलाल ताल के पत्ते से धुन निकालते थे। मशहूर गीतों और भजनों की हूबहू धुन पत्ते से निकालने वाले वे पक्के कलाकार बन गए। किसी ने उनकी कला को पहचाना और तारीफ की। उन्हें पत्ते को वाद्ययंत्र बनाकर बजाते 36 साल हो चुके हैं। उदयपुर में एक कार्यक्रम के दौरान एक सैलानी ने उनका हुनर देखा। अचंभित हुआ। बात की और वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया। सैलानी ने पूछा- ये कला कहां से सीखी। शंभूलाल बोले- वहीं से जहां बकरियां चराया करता था। कहकर वे हंसने लगे। इनपुट सहयोग- ऋषभ सैनी (जयपुर), काका सिंह (श्रीगंगानगर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगाी।

