नमस्कार, देश के सर्वश्रेष्ठ होटल प्रबंधन कॉलेज की किचन में केंद्रीय पर्यटन मंत्रीजी ने पकौड़े तल दिए, लेकिन एक बात भूल गए। देश के जेन-जी आंदोलन के बाद झुंझुनूं में ‘अल्फाओं’ ने भी आंदोलन छेड़ रखा है और शराब ठेकेदारों ने अपने ही मुंह से सारे भेद उगल दिए। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. पकौड़े बनाते मंत्रीजी क्या भूले? केंद्रीय पर्यटन मंत्रीजी मन मुताबिक कहीं भी पर्यटन कर सकते हैं। इसी अधिकार का उपयोग करते हुए वे अपने विभाग के अधीन आने वाले देश के सर्वश्रेष्ठ होटल प्रबंधन कॉलेज पहुंच गए। इसी कॉलेज में होटल मैनेजमेंट की बारीकियां सिखाई जाती हैं। यहीं से सीखकर बड़े-बड़े शेफ निकलते हैं। कैटरिंग का क-ख-ग-घ का ज्ञान लेकर युवा देश-दुनिया के कोन-कोने में जाकर किचन संभालते हैं। हां, तो मंत्रीजी इस कॉलेज पहुंचे तो उनका मन अपनी पाक-कला दिखाने के लिए मचल उठा। मंत्रीजी किचन में पहुंच गए। उन्होंने हाथों में दस्ताने पहने और ब्रह्म वाक्य कहा- सीखना आदमी को सबसे चाहिए। सीखने का ऐलान करते हुए मंत्रीजी ने आलू कोफ्ते का मसाला तैयार कर लिया। उसे बेसन के घोल में लपेट लिया। सधे हाथों से गर्म तेल की कड़ाही में छोड़ दिया। कोफ्ते पकने तक समोसों की प्लेट बेक करने के लिए बेकिंग मशीन में डाल दी। अपने बनाए व्यंजन स्टाफ को सौंपते हुए मंत्रीजी बोले- बताओ कैसा है? जोश में उन्होंने इस घटनाक्रम का वीडियो एक्स पर भी शेयर कर दिया। लिखा- मेरी बनाई डिश का स्वाद चखने के बाद सबने कहा, “सर, अच्छा बना है!” गौर करने वाली बात ये रही कि देश के सर्वश्रेष्ठ होटल प्रबंधन कॉलेज की किचन में करछी चलाते वक्त मंत्रीजी ने ‘शेफ कैप’ नहीं पहना था। ऐसे में किसी भी व्यंजन में बाल गिर सकता है। अगर किसी भाई के समोसे में सफेद बाल निकल आए तो नाराज नहीं होना। मंत्रीजी की निशानी समझकर रख लेना। 2. Gen-Z के बाद अल्फा का ‘आंदोलन’ नई पौध है खतरनाक। इन्हें जेन-जी और अल्फा के नाम से पहचाना जाता है। ये पीढ़ियों के नाम हैं। वो बच्चे जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए जेन-जी हैं। जो 2010 से अब तक हुए हैं, सब अल्फा हैं। जेन-जी की जिद के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्रीजी को इस्तीफा देना पड़ा। आंदोलन भी अजब-गजब। सोलह कलाओं के बाद जितनी भी कलाएं आती हैं, सब जेन-जी पीढ़ी ने दिखा दी। एक तरफ जेन-जी ने किसी को पद से हटाने के लिए आंदोलन चलाया। तो दूसरी तरफ अल्फा पीढ़ी किसी को दोबारा पद पर बैठाने के लिए आंदोलन कर रही है। अल्फा का ये आंदोलन झुंझुनूं के नवलगढ़ में चल रहा है। सरकारी स्कूल के बच्चों को राजेंद्रजी सर संस्कृत पढ़ाते थे। तबादलों की लहर में उनका भी इस स्कूल से ट्रांसफर हो गया। अल्फा बच्चों को बर्दाश्त नहीं कि उनका प्रिय शिक्षक उनकी मर्जी के बिना हटा दिया जाए। फिर क्या था, स्कूल पर ताला जड़ दिया गया। बच्चे गेट पर जुट गए। नारेबाजी शुरू। बोले-हमारे टीचर वापस लाओ। एक बच्ची बोली- वो बहुत अच्छा पढ़ाते थे। पत्रकार ने समझाने की कोशिश की। दूसरे टीचर भी अच्छा पढ़ाएंगे। दूसरी बच्ची बोली- हमें तो वही सर चाहिए। बच्चों वाली जिद। खैर, गांव के जेन-एक्स भी अल्फाओं के साथ हैं। जेन-एक्स वो पीढ़ी, जिसका जन्म 1965 से 1980 के बीच हुआ। एक काका आगे बढ़े। अल्टीमेटम दिया- 2 दिन का वक्त दे रहे हैं। राजेंद्र सर को दोबारा नहीं लगाया तो रास्ता बंद कर देंगे। जोश के हिसाब से ये वाली पीढ़ी भी जेन-जी अल्फा से कम नहीं। 3. चलते-चलते… अब तक सुना था कि शराब पानी सेहत के लिए हानिकारक है। अब सुनने में आ रहा है कि शराब बेचना भी हानिकारक है। शराब बेचने वाले उस स्थिति में पहुंच गए हैं कि मकान बिकने की नौबत आ गई। खुद शराब ठेकेदारों ने आबकारी ऑफिस में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के सामने बैठकर ये बात कही। एक ठेकेदार बोला- हम सरकार को रेवेन्यू दे रहे हैं तो हमें सुविधा भी मिलनी चाहिए। आपने हमें टारगेट दिया। उतनी शराब नहीं बेच पाते तो आप 150 गुना पैनल्टी लगाते हो। प्रेसवालों के स्टिंग ऑपरेशन की परवाह किए बिना हम रात 8 बजे के बाद शराब बेचते हैं। एक बंदा दुकान में ही सोता है ताकि शटर खटखटाए जाने पर तुरंत शराब बेच सके। हम 24 घंटे शराब बेचते हैं। उस राज्य को भी 6 हजार करोड़ की शराब बेच रहे हैं, जहां शराबबंदी है। आपने हमें साढ़े 7 हजार दुकाने अलॉट की। हम 50 हजार दुकानों पर शराब बेचते हैं। हम स्टिंग करने वाले मीडिया को मैनेज करते हैं, शराब का विरोध करने वाले साहूकारों को मैनेज करते हैं, पुलिसवालों को मैनेज करते हैं, आबकारी और पुलिस विभाग की मंथली मैनेज करते हैं। इसके बाद जितना हम कमाते हैं, उसका 6 गुना आपको कमाकर देते हैं। सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को क्यों काटते हो साहब? हम आपको 1 साल में 20 हजार करोड़ रुपए दे तो रहे हैं कमा के। अगर सभी ग्राम पंचायतों को 5 साल के लिए 5-5 करोड़ दो तब भी सरकार के पास 42 हजार करोड़ रुपए बचेंगे। शराब ठेकेदार खुद अपने मुंह से भेद खोले जा रहे थे और आबकारी अधिकारी मुंह लटकाकर बैठे थे। किसने किसकी पोल खोली? पता नहीं। इनपुट सहयोग- जयदीप पुरोहित (जोधपुर), राजकुमार शर्मा (नवलगढ़, झुंझुनूं)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

