कई दिनों बाद राजा दरबार पहुंचे तो क्या हुआ?:राज-पाट क्यों छोड़ दिया? ‘बणी-ठणी’ की अनसुनी कहानी का अंतिम अध्याय; पार्ट- 4

राजस्थानी प्रेम कहानी के पार्ट-3 में आपने पढ़ा कि किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह ने दरबारी कलाकार से बणी-ठणी की पेंटिंग बनवाई, जो प्यार और सुंदरता का अद्भुत संगम था। पार्ट-4 में पढ़िए आगे की कहानी… अब राजा सावंत सिंह का अधिकांश समय संगीत और भक्ति के आनंद में बीतने लगा था। जिसके चलते वे राजकाज, दरबार और रियासत को कम समय देने लगे। इसको लेकर दरबार में चिंता गहराने लगी। मंत्री बेचैन थे, क्योंकि राजा अब एक शासक कम, भक्त अधिक हो गए थे। कई दिनों बाद राजा जब दरबार पहुंचे तो वहां जैसे असुरक्षा का भाव था। महाराज आपका अधिकतर समय काव्य, रचना और भक्ति संगीत में व्यतीत होता है। क्या कला के लिए राजकाज और राज्य की सुरक्षा को दांव पर लगाना उचित है, महाराज? वरिष्ठ मंत्री ने चिंता जताई। सभी मंत्रियों ने इसपर सहमति दिखाई। मंत्री के इस प्रश्न पर सावंत सिंह गहरी सोच में पड़ गए, और उस दिन मौन रहते हुए सिंहासन से उठकर चले गए। दरबार की चिंता धीरे-धीरे महल के गलियारों से होकर आम जनता के बीच पहुंचने लगी। राजा ये सब देख और समझ रहे थे। हमेशा की तरह उस दिन दरबार फिर शुरू हुआ। माहौल में निराशा और गहन शांति थी। राजा ने साधारण कपड़ों में दरबार में प्रवेश किया। आप सबकी चिंता उचित है। लेकिन मेरे लिए कृष्ण प्रेम और भक्ति का मार्ग ही सबसे प्रिय रहा है। प्रजा के हित को ध्यान में रखते हुए मैं सिंहासन का त्याग कर वृन्दावन के लिए प्रस्थान करने का निर्णय लेता हूं, सावंत सिंह ने भरे दरबार में सिंहासन त्यागने की घोषणा कर दी। राजा के इस फैसले से सभी उदास थे, लेकिन कुछ कर नहीं सकते थे। सिवाय इसके कि अपने राजा को अंतिम विदाई दें। समय बीता और ‘बणी-ठणी’ का मन भी दरबार से ऊब गया। अंततः उन्होंने भी अपना बाकी जीवन वृंदावन की पवित्र भूमि पर गुजारने का फैसला लिया। कहा जाता है कि राजा सावंत सिंह और ‘बणी-ठणी’ ने वृन्दावन की साधारण कुटिया में रहते हुए अपना शेष जीवन प्रभु की भक्ति, भजन और काव्य रचना को समर्पित कर दिया। और इस तरह राजा सावंत सिंह और बणी- ठणी की कहानी निहाल चंद के चित्रों में ‘राधा-कृष्ण’ के रूप में हमेशा के लिए कैद हो गई। आज भी किशनगढ़ की झील, महल और दीवारों में दबी यह कहानी किशनगढ़ शैली के चित्रों में से झांकती प्रतीत होती है। नागरीदास और रसिकबिहारी की लिखी रचनाओं की गूंज आज भी वृन्दावन की गलियों में सुनी जा सकती है। (कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। फोटो व पेंटिंग आभार : किशनगढ़ पूर्व राजपरिवार, चित्रकार, शहज़ाद अली शेरानी ) ग्राफिक्स – भाविक जैन
इनपुट सहयोग- रोहित पारीक
…… ये भी पढ़िए… 1. प्रेम कहानी जिसे शब्दों ने लिखा, रंगों ने जिंदा रखा:’बणी-ठणी’ क्या सिर्फ एक कल्पना है या वाकई कोई महिला थी? पार्ट- 1 बणी- ठणी कौन थी? ऐसा क्या था उस तस्वीर में जो राजस्थान की धरोहर बनी, जिसने किशनगढ़ शैली को दुनिया भर के कला जगत में पहचान दिलाई। जानते हैं राजा सावंत सिंह और बणी- ठणी की कहानी, जिनके प्रेम और भक्ति को कलाकार निहाल चंद ने अमर कर दिया। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए 2. खुद को कृष्ण मानते थे राजा, ‘बणी-ठणी’ को राधा:विदेशियों ने माना था भारत की मोनालिसा, ऐसा प्रेम जिसने किशनगढ़ को वृंदावन बना दिया; पार्ट–2 राजा सावंत सिंह के जीवन को भक्ति और कविता पूर्णता प्रदान करते थे, लेकिन उस दिन बणी-ठणी को सुनने के बाद उनकी साधना में अध्यात्म का एक नया और गहरा आयाम जुड़ गया था। धीरे- धीरे राजा और बणी- ठणी का रिश्ता जैसे राधा और कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम का रूपक बन गया था। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए 3- राजा ने किस महिला की बनवाई रहस्यमयी पेंटिंग:पहचान पर आज भी बहस; प्यार और सुंदरता का अद्भुत संगम, पार्ट-3 राजा सावंत सिंह और बणी-ठणी की कहानी में दोनों के श्रीकृष्ण और अध्यात्म की ओर झुकाव की विशेष भूमिका थी, जिसके चलते राजा ने बणी-ठणी में राधा की छवि को देखा था। एक शाम राजा सावंत सिंह ने निहाल चंद को बुलाया और बोले – मुझे खास चित्र बनाना है निहाल चंद। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए
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