कल के एपिसोड में आपने पढ़ा कि राणा महेंद्र मूमल से बिना मिले वापस अमरकोट लौट गए थे। इस वजह से मूमल बेचैन थी। पढ़िए आगे की कहानी – राणा महेंद्र को हुई गलतफहमी की पीड़ा मूमल के लिए असहनीय थी। उसने राणा को कई संदेश भिजवाए, लेकिन मूमल का एक भी संदेश राणा तक नहीं पहुंचा। कहते हैं मूमल के उन संदेशों को अमरकोट महल वासियों ने जान बूझकर राणा तक पहुंचने नहीं दिया था। इधर राणा ने मान लिया था कि मूमल ने उन्हें धोखा दिया है। जब किसी भी प्रयास ने काम नहीं किया तो मूमल अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए जोगन भेष में अमरकोट पहुंच गई। वहां उसने महेंद्र से मिलने की बहुत कोशिश की, लेकिन नाकाम रही। हार कर मूमल ने अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए ‘अग्नि परीक्षा’ का निर्णय लिया। अग्नि को समर्पण करते हुए उसने अंतिम बार गुहार लगाई – महेंद्र ! एक बार सुन लीजिए…वह मेरी बहन थी ! एक खेल था, कहते – कहते हताश मूमल ने प्राण त्याग दिए। ऐसा भी कहा जाता है कि अमरकोट में किसी ने मूमल से झूठ कह दिया था कि राणा का देहांत हो गया, जिसे सुनकर वह सदमे में आ गई और उसने अपने प्राण त्याग दिए। मूमल के जाने का दुख सहन नहीं कर सके राणा महेंद्र इधर, राणा महेंद्र को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मूमल अग्नि की लपटों में समा चुकी थी। इस गहरे पछतावे के साथ कि वे अपने विश्वास की परीक्षा में हार गए, राणा ने भी अपने प्राणों की आहूति दे दी। इसके साथ ही दुखद अंत हुआ उस प्रेम कहानी का जिसे आने वाली पीढ़ियां मरुधरा के धोरों में सदियों जीवित रखने वाली थीं। लोक गीतों में जी उठती है मूमल-महेंद्र की प्रेम कहानी लौद्रवा के स्थानीय लोग आज भी मूमल-महेंद्र की प्रेम कहानी के दुखद अंत को सुनाते हुए गंभीर हो उठते हैं। वे बताते हैं कि प्राचीन समय में काक नदी का पानी लाल था, जिसे आंखों पर लगाने से आंखों की रोशनी वापस आ जाती थी। जैसलमेर के लोक कलाकार आज भी अपने लोकगीतों में मूमल के सौंदर्य का वर्णन करते नहीं थकते। इतना ही नहीं, हर साल जैसलमेर के मरु महोत्सव में आयोजित होने वाली महेंद्र-मूमल और मिस मूमल प्रतियोगिता मूमल के सौंदर्य और इस अमर प्रेम को आज भी जीवित रखे हैं। जैसलमेर के धोरों में आज भी अक्सर यह गूंज सुनाई देती है – आओ नी पधारो म्हारे देस, मूमल थारी वाट जोवे…(आओ, हमारे देश पधारो, मूमल तुम्हारा रास्ता देख रही है…) ……और आज भी, जब सूरज ढलता है तो मूमल की मेड़ी के खंडहर और काक नदी का सूखा किनारा चीख-चीख कर कहते हैं कि मोहब्बत में दूरी मीलों की नहीं, सिर्फ एक गलतफहमी की होती है। (कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। सोर्स :राजस्थानी साहित्य, लोक कथाएं व स्थानीय लोगों से बातचीत ) …. महेंद्र-मूमल की प्रेम कहानी के पहले 3 एपिसोड…. 1. रेगिस्तान में काक नदी के किनारे था मूमल का महल:अमरकोट के राजा और जैसलमेर की राजकुमारी का प्रेम; 4 एपिसोड में मूमल-महेंद्र की कहानी जैसलमेर के लौद्रवा की राजकुमारी मूमल और अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान) के राणा महेंद्र की प्रेम कहानी सदियों पुरानी है। इस कहानी को जानने के लिए दैनिक भास्कर जैसलमेर से 14 किलोमीटर दूर लौद्रवा गांव पहुंचा। पूरा एपिसोड… 2. कांच का पानी और शीशों का खेल:हजारों राजकुमार नाकाम, फिर अमरकोट के राणा ने कैसे पार की मूमल की खतरनाक पहेलियां? मूमल-महेंद्र प्रेम-कहानी एपिसोड-2 मूमल इंतजार में थी उस राजकुमार के जो उसकी खूबसूरती से ज्यादा उसकी पहेलियों की गहराई को समझ सके। लौद्रवा का महल उसी का स्वागत करेगा जो बिना डरे काक महल की पहेलियों को सुलझा पाएगा। पूरा एपिसोड… 3. मीलों का सफर और वो एक रात:आधी रात मूमल के कमरे में राणा महेंद्र ने ऐसा क्या देखा कि बिना मिले लौट गए? एपिसोड-3 वो रात बातों और वादों में बीत गई। मूमल और महेंद्र अब एक-दूसरे के प्रेम में बंध चुके थे। दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया, लेकिन एक बड़ी समस्या थी? पूरा एपिसोड…

