अंधेरी रात में निकली ‘लंगूर-गैंग’:कार में AC की हवा खाई तो ‘खिंचाई’; बोनट पर बैठकर बनी ‘सहमति’

नमस्कार सीकर में वन मंत्री ने कार का AC चलाकर बैठे पुलिसकर्मी को लताड़ दिया। जयपुर में सांसद-अफसर में कार के बोनट पर बैठकर सहमति बनी। उदयपुर में चोरी करने निकली लंगूर गैंग नाकाम रही और आदिवासी जिले के अधिकारी ने वॉट्सऐप ग्रुप में डाल दिया सुसाइड वाला मैसेज। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. कार का AC चलाकर बैठना महंगा पड़ा संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी। उन्होंने धृतराष्ट्र को घर बैठे ही महाभारत का सारा हाल कह सुनाया था। ये वो संजय नहीं। बल्कि वन मंत्री संजय शर्मा हैं, लेकिन दृष्टि मंत्रीजी की भी दिव्य से कम नहीं। सीकर गए थे। वहां अहम मीटिंग थी। पानी बचाने को लेकर मुहिम चली हुई है। जिसे वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान-2026 नाम दिया गया है। इसी अभियान की जिले में क्या प्रोग्रेस चल रही है और अब तक क्या काम हुआ, इस पर अफसरों से चर्चा करने वन मंत्री पहुंचे थे। संवाद सभागार की ओर मंत्रीजी जा रहे थे कि एक पुलिस की गाड़ी चालू हालत में खड़ी मिली। इंजन घरघरा रहा था। मंत्रीजी ने विंडो से झांककर देखा तो भीतर ड्राइवर पुलिसकर्मी कार का AC चलाकर विश्राम की मुद्रा में था। मंत्रीजी एक मिनट के लिए भूल गए कि पानी बचाने के उद्देश्य से आए हैं, उन्हें कार का व्यर्थ होता ईंधन ध्यान आया। यह भी याद आया कि ईंधन बचाने का दौर चल रहा है। मंत्रीजी का पारा चढ़ा। उन्होंने ड्राइवर को बाहर निकलने को कहा। फिर फटकारा- बिना AC रह नहीं सकते? याद नहीं प्रधानमंत्री ने क्या आह्वान किया था। खुद को इतना बड़ा समझते हो? दबी जुबान में पुलिसकर्मी ‘सॉरी’ जैसा कुछ बुदबुदाया। मंत्रीजी ने डायरी-पेन संभाले सहायक से कहा- नाम लिखो इनका। 2. बोनट पर बनी ‘सहमति’ जब-जब कोई आंदोलन लंबा खिंचता है और परिणाम नहीं निकलता तो हनुमानजी को कंधे पर बैठाकर वहां ले आया जाता है। या फिर हनुमानजी खुद अपनी सेना लेकर वहां पहुंच जाते हैं और आंदोलनकारियों को अभयदान दे देते हैं। उनके पास कूच का अचूक हथियार है। वे कूच का ऐलान करते हैं तो हनुमान सेना सैकड़ों-हजारों की तादाद में मौके पर जुट जाती है। भैराणा धाम (जयपुर) के संतों का कहना है कि धाम के आस-पास शांत वन क्षेत्र है, जहां विविध जंतु विचरण करते हैं, वनस्पतियां लहलहाती हैं। सरकार रीको लाकर यहां विकास करना चाहती है। विश्वास और विकास की जंग चलने लगी। इसी जंग में हनुमान कूद पड़े और उन्होंने अचूक हथियार का इस्तेमाल किया। राजधानी कूच का ऐलान सुनते ही सेना जुटने लगी। हजारों लड़ाके जुट गए। राजधानी की ओर चल पड़े। एक नाका ध्वस्त कर दिया। फोर्स ने मोखमपुरा में रोका। प्रशासन बात करने आ गया। कलेक्टर साहब आए। रेंज आईजी आए। गाड़ी के बोनट पर चढ़कर बात हुई। सहमति ये बनी कि कमेटी बनेगी। रिपोर्ट देगी। इसके बाद आगे का काम होगा। फिलहाल एक महीने के लिए तो सब शांति है। 3. अंधेरी रात में निकली लंगूर गैंग कवि वृंद ने एक सुंदर बात कही है- करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। यानी बार-बार प्रैक्टिस करने से मूर्ख व्यक्ति भी ज्ञानवान हो सकता है। आगे वे उदाहरण देकर बात पूरी करते हैं- रस्सी आवत जात ते सिल पर पड़त निसान। अर्थात कुएं की पाल से टकराकर बार-बार रस्सी गुजरती है तो पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं। इसी उक्ति को ध्यान में रखते हुए उदयपुर के खेरवाड़ा इलाके में कुछ चोर बार-बार नयागांव पहुंच रहे थे। उनके निशाने पर प्रियदर्शी नाम का ज्वेलर। चोर तीन बार पहले भी उसकी दुकान पर धावा बोल चुके। वे संकड़ी गली की ओर खुलने वाली खिड़की पर लूमते-लटकते, सींखचों को खींचते-मरोड़ते, जोर-आजमाइश करते। फिर असफल होकर खाली हाथ लौट जाते। स्वर्णकार ने भयभीत होकर गली में सीसीटीवी लगवा दिया। चोरी के चौथे प्रयास को उसने रिकॉर्डिंग में देखा। चोरों की आंखें हल्की रोशनी में जानवरों की तरह चमक रही थीं। लग रहा था कि एलियन धरती पर उतर आए। एक चोर कैमरे के पास आया। वह लंगूर वाला मुखौटा लगाए हुए था। सभी ने मेले-ठेले से खरीदे लंगूर मुखौटे लगाए थे। चोरों का चौथा प्रयास भी फेल। उनकी मेलाखर्ची तक नहीं निकल रही। फिर भी चोर तो पूरी मेहनत कर रहे हैं। लेकिन पुलिस क्या कर रही है? 4. चलते-चलते.. मिर्जा गालिब ने कहा है- दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त, दर्द से भर न आए क्यों। रोएंगे हम तो जार-जार कोई हमें सताए क्यों। आदिवासी जिले में तैनात एक विभाग के अफसर भीतर ही भीतर टूट गए। वे तंग आ गए। हो न हो, वे सताए हुए होंगे। विभाग के कर्मियों ने वॉट्सऐप ग्रुप बना रखा था। उसी पर अफसर साहब ने बिना किसी शेरो-शायरी के लिख दिया- जी चाहता है आत्महत्या कर लूं। विभाग में हड़कंप मच गया। सुनी-सुनाई बात है कि साहब ने साफ-साफ कारण नहीं लिखा। कारण नहीं तो निवारण कैसे हो? बाकी साथी कर्मचारी यह सोच कर डर रहे कि सताने वालों में हमारा नाम न ले दें। अधिकारी को समझा-बुझा भी रहे हैं कि कहीं जी चाहा न कर लें। अधिकारीजी को सब्र करना चाहिए। कहावत भी है- सब से सब्र नहीं होता, लेकिन सब्र से सब हो जाता है। बात खरी है में तो इतना ही। बाकी कोटा में गर्मी ऐसी कि शेर तेंदुओं के लिए भी फव्वारे लग गए हैं। दैनिक भास्कर एप पर यह खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- ग्राउंड रिपोर्ट इनपुट सहयोग- सुरेंद्र माथुर (सीकर), स्मित पालीवाल (जयपुर), अनूप पाराशर (उदयपुर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
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