नमस्कार पटवारी साहब रिश्वत लेते धरे गए, अब उन्हें हमेशा ढोल की गूंज सुनाई देगी। साइकिल-डे पर डिप्टी सीएम और कृषिमंत्रीजी ने सुहाना सफर के वीडियो शेयर किए। RTO संघ के अध्यक्ष बनने के बाद इंस्पेक्टर साहब अपने गांव काफिला लेकर पहुंच गए और विदाई हो तो शेरगढ़ SHO साहब जैसी। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. ढोल बजने लगा.. गांव में अचानक ढोल बजने लगा। सारा गांव जुट गया। लोग खुशी में चिल्ला रहे थे- बजाओ रे। ये ढोल किसी सगाई, शादी, जलवा, त्योहार, सवामणी, दसोटन, चुनाव, जॉइनिंग या रिटारमेंट की खुशी में नहीं बज रहा था। जिन्हें पता नहीं था वे ठिठककर पूछने लगे। पता चला कि पटवारीजी 8 हजार की रिश्वत लेते धरे गए। पटवारघर के बाहर एसीबी टीम की दो गाड़ियां लगी हुई थीं। खबर सुनने वाला भी खुशी में झूमने लगा। बोले- जमीन की नाप-जोख से लेकर हर काम में पैसे की डिमांड होती थी। बढ़िया काम हो गया। पटवारीजी ऐसे देवता साबित हुए जिन पर चढ़ावा चढ़ा-चढ़ा कर लोग परेशान हो गए थे। इसलिए कार्रवाई हुई तो उत्सव मनाने लगे। 1986 में एक फिल्म आई थी- कर्मा। इसी का एक संवाद था-इस थप्पड़ की गूंज तुम्हें हमेशा सुनाई देगी। कई अफसर कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े जाते हैं। कुछ समय बाद फिर बहाल हो जाते हैं। एसीबी की कार्रवाई को भी कुछ दिन बाद भुला दिया जाता है। लेकिन पटवारीजी को इस ढोल की गूंज हमेशा सुनाई देगी। हर भ्रष्टाचारी के कानों में इसी तरह की गूंज सुनाई देनी चाहिए। 2. साइकिल-डे समय बड़ा बलवान। एक वक्त था, जब सारी दुनिया पैदल चलती थी। साइकिल पर चलने वाला अमीर कहलाता था। इसके बाद शादियों में साइकिल-रेडियो के दहेज की डिमांड होने लगी। फिर मोटर कारों का जमाना या गया। अब ईंधन की कमी से कारें भी हांफने लगी हैं। ऐसे में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की बयार है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता। सड़कों पर गाड़ियों का रेला है। जाम अब आम है। दुनिया भाग रही है। लेकिन जैसे ही कोई संकट आता है तो याद आती है साइकिल। वो साइकिल जो पेट्रोल नहीं पीती, जो बैटरी के सहारे नहीं चलती। वही साइकिल जो इम्तिहान में अच्छे नंबर लाने पर मिलती थी। वही साइकिल जो सपना हुआ करती थी। वही साइकिल जिस पर बचपन खूब ढोया। साइकिल ने पर्यावरण बचाया। सेहत बनाई। फिर भी मोटरों की रेस में पिछड़ गई। साइकिल-डे पर माननीयों ने साइकिल चलाई। रील बनवाई। गाना लगाया- जिंदगी एक सफर है सुहाना। यहां कल क्या हो किसने जाना। जिस हिसाब से बचत करने के आह्वान किए जा रहे हैं, जरूरी है कि साइकिल सिर्फ रील में न रहे, रोजमर्रा की जरूरत बन जाए तो बेहतर। बाकी माननीयों के लिए साइकिल की डिमांड पर साइकिल आ जाएगी, हाथी की डिमांड पर हाथी आ जाएगा और हेलिकॉप्ट की डिमांड पर हेलिकॉप्टर आ जाएगा। आम आदमी को अगर बचत करनी है, ईंधन बचाना है और सेहत सही रखनी है तो साइकिल से बेहतर जरिया क्या हो सकता है? 3. काफिला वे राजस्थान में परिवहन निरीक्षक संघ के नए अध्यक्ष बने हैं। उनका काम परिवहन के नियमों पर प्रदेश को चलाना है। जीत की खुशी में वे नियम भूल गए। कार के सनरूफ से प्रकट होकर आशीर्वाद की मुद्रा में अपने गांव में दाखिल हुए। आगे पीछे कुल मिलाकर 7-8 गाड़ियों का काफिला था। यह सब उसी समय हुआ जब मंत्री-नेता-अफसर सब साइकिल पर मशक्कत करते हुए ईंधन बचाने का संदेश दे रहे हैं। काफिले घटा रहे हैं और ईवी पर जा रहे हैं। जब पूरे परिवहन सिस्टम के ही मालिक बन गए तो फिर डर काहे का। काफिले में डिपार्टमेंट की गाड़ियां एस्कॉर्ट में लगा दी। हालांकि इनके साथ विवादों का भी लंबा काफिला रहा है। अपने इलाके के विधायकजी से इनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। इन्होंने विधायकजी की रोड कंस्ट्रक्शन कंपनी पर 25 लाख का जुर्माना लगा दिया था। कहा था- सड़क खराब है। सड़क के साथ-साथ विधायकजी का दिमाग भी खराब हो गया। उन्होंने इनकी शिकायत कर दी। इन्हें सस्पेंड कर दिया गया। ये हाईकोर्ट पहुंच गए। हाईकोर्ट ने सस्पेंशन पर रोक लगा दी। इसके बाद ये फेसबुक पर अवतरित हुए। एक फिल्म का डायलॉगनुमा बयान दिया- ये वर्दी दहेज में नहीं मिली। न किसी मंत्री संतरी की सिफारिश से मिली है। किसी को अहम या वहम हो कि रॉबिन सिंह ड्यूटी पर होगा और बिना फिटनेस-ओवरलोड गाड़ी निकाल लेंगे तो सुन लो- ‘मैं उनमें से नहीं जो पतली गली से गुजर जाऊं। मैं वो हूं जो खिड़की-दरवाजे तोड़कर अंदर आऊं। जब मरूं तो मेरा हाथ मेरी मूंछों को ताव दे रहा हो और..’ डायलॉग भी किसी काफिले से कम नहीं था। 4. चलते-चलते.. विदाई की वेला आ गई थी। SHO साहब भावभीना भाषण दे रहे थे। प्रशासन के अधिकारी, परिवारजन, रिश्तेदार और मौजिज लोग मौजूद थे। इस बीच कई साथी उठकर बाहर चले गए। SHO का विदाई भाषण जारी रहा। वे बोले- 1989 में कॉन्स्टेबल के पद पर जॉइन किया। 38 साल की सर्विस में लगभग 25 थानों में तैनाती रही। शेरगढ़ में 8 महीने का कार्यकाल बेदाग रहा। कभी किसी अफसर के आदेश की अवहेलना नहीं की। आधी रात भी फोन आया तो काम किया। प्रशासन के लोगों और गांव वालों का भरपूर साथ मिला। खुशी है कि बेदाग रिटायर हो रहा हूं। इस बीच किसी ने सवाल पूछ लिया- अब क्या करेंगे? क्या राजनीति में जाने की इच्छा है? साहब हंसे। बोले- किसी ने ऑफर दिया तो जरूर राजनीति में जाएंगे। हंसी-खुशी के ठहाके और भावों से भीगी आंखों के साथ साहब बाहर निकले। मन में सवाल यही कि स्टाफ के साथी बाहर क्यों चले गए। मालाओं से लदकर जब थाने के गेट पर आए तो स्टाफ के साथी डांस की तैयारी में थे। साहब आए और साथियों के साथ डांस शुरू कर दिया। भावनाओं से भारी हुआ मन हल्का हो गया। इनपुट सहयोग- शिवम ठाकुर (जयपुर), खेताराम जाट (बाली, पाली)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

