नमस्कार, राजस्थान के सरकारी स्कूलों की पोल-पट्टी खोलने की होड़ मची है, ऐसे में नजर उन स्कूलों पर भी जानी चाहिए जहां अच्छा काम हुआ है। जोधपुर का ट्रैफिक भी कमाल है, यहां ट्रक नीम उखाड़कर चल देता है और बीच रोड गाड़ी पार्क हो जाती है। उधर, सीकर में पर्यावरण प्रेमी का अनोखा मिशन चल रहा है। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. देखने का नजरिया.. नजारा बड़ी चीज है या नजरिया? दोनों का अपना महत्व है। इस वक्त सरकारी स्कूलों की पोल खोलने के नजारे दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो जैसे बाढ़ आ गई है। हर कोई किसी न किसी सरकारी स्कूल में पहुंच रहा है और रील-क्रांति कर रहा है। ऐसी बात नहीं है कि शिक्षा व्यवस्था में कमी नहीं है। भारी कमी है। आजादी के 80 साल बाद भी अगर बच्चे जर्जर छतों के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं तो सवाल उठेंगे। प्रतापगढ़ में एक स्कूल ऐसा है जहां पहुंचने के लिए बच्चे खजूर का पुल पार करते हैं। यह पुल भी कुदरत की देन है। भरतपुर में बच्चे घुटनों तक पानी से होकर स्कूल पहुंचते हैं। कोटपूतली के शाहजहांपुर में मिड डे मिल बनाते वक्त गैस सिलेंडर भभक उठा। इन सब पर राजनीति करने से अच्छा है कि इस नजारे को बदलने की कोशिशें की जाएं। भामाशाह जुटाए जाएं। स्कूल भवनों को सुधारने का मिशन चले। जहां टीचर्स की कमी है वहां लोग पढ़ाने के लिए आगे आएं। बच्चों को अच्छी शिक्षण सामग्री जुटाकर दी जाए। जरूरत इमारत नहीं बल्कि नजरिया बदलने की है। पाली के चोटिला में महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय में भी सुविधाओं के नाम पर कुछ खास नहीं है। लेकिन यहां बच्चे अंग्रेजी में शपथ लेते हैं। नन्ही बच्ची शपथ दिलाती है। टीचर्स के प्रयास से बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल कर रहे हैं। स्कूल से वही लेकर जाना जरूरी है। कुछ प्राइवेट फर्म स्कूलों की तस्वीर बदलने के लिए काम भी करती हैं। कोटा के लाडपुरा का सरकारी बालिका स्कूल सभी सुविधाओं से परिपूर्ण हैं। कमी दिखने पर सुधार जरूरी है, न कि कमी को छुपाना। कोटा में लोकसभा अध्यक्ष और सांसद ओम बिड़ला जी ने मोतियाबिंद समेत आंखों की बीमारी से जूझ रहे लोगों का इलाज कराया और हाल-चाल पूछा। नजर का इलाज संभव है। नजरिए का नहीं। 2. जोधपुर का ट्रैफिक ‘कमाल’ जोधपुर की ट्रैफिक व्यवस्था कमाल है। राजस्थान के पर्यटन की टैग लाइन रही- जाने क्या दिख जाए? इसी तर्ज पर जोधपुर में भी ट्रैफिक का कोई भी रूप देखने को मिल सकता है। सरदारपुरा का हाल ये है कि खरीदारी करने कार से निकले लोग कहीं भी गाड़ी खड़ी कर शॉपिंग कर सकते हैं। गोल्ड बिल्डिंग से लेकर चिल्ड्रन पार्क तक यही हाल। त्योहार आ रहा है। मिठाई खरीदनी हो। राखी खरीदनी हो। लहरिया खरीदना हो। कोई टेंशन नहीं। टेंशन उन्हें हो जिन्हें यहां से निकलने की जल्दी हो। वे पैदल निकलें या दुपहिया पकड़ें। उनका सिरदर्द। इस बीच ट्रैफिक पुलिस क्या होती है, यह यहां चिड़ी का बच्चा भी नहीं जानता। पुलिस सिर्फ अभियान चलाकर काम करती है। सांगरिया फांटा का हाल और भी बुरा। दूर से एक ट्रक आता दिखाई देता है। ट्रक पर कंटेनर लदा है। आप सोचेंगे कि कंटेनर में आयात-निर्यात से संबंधित कुछ होगा। लेकिन नहीं। कंटेनर पर दिखता है नीम का बड़ा पेड़। ट्रक वाला पूरा पेड़ ही उठा लाया। मजे की बात ये कि फिर लगातार चला भी जा रहा है। उसे खंभे नहीं दिख रहे। लोग नहीं दिख रहे। लोग वीडियो बनाने लगते हैं। हंसते हैं। पुलिस कहां है? चिड़ी का बच्चा भी नहीं जानता। एक इलाके में ट्रैफिक पुलिस नजर आती है। शाम गहरा चुकी है। एक युवक मोटर पार्ट्स खरीदने आता है। दुकान के सामने वह गाड़ी खड़ी कर देता है। वहां दुपहिया खड़ी खरने का पर्याप्त स्पेस भी नजर आ रहा है। इतने में पुलिस की गाड़ी आती है और खड़ी बाइक का चालान काट देती है। परेशान युवक जेब से मोबाइल-नुमा हथियार निकालकर साहब के सामने रिरियाता है- खड़ी गाड़ी का चालान कौन काटता है सर? सर का ध्यान उसकी परेशानी पर नहीं, मोबाइल कैमरे पर है। वे अकाट्य तर्क देते हैं- ऐसे खिलौने हमारी काम में भी लगे हैं। कहकर साहब ड्राइवर को कार आगे बढ़ाने को कहते हैं। पीछे से युवक ‘गरीब की हाय’ जैसा कुछ बोलता है- साले एक नंबर के चोर हैं। 3. चलते-चलते.. एक छोटी सी आदत कितना बड़ा बदलाव ला सकती है। पर्यावरण प्रेमी अजय माथुर की एक आदत है। वे जब भी पहाड़ों पर भ्रमण करने जाते हैं तो अपने साथ बीज लेकर जाते हैं। ये बीज कांटेदार झाड़ियों, जंगली पौधों और फल-छायादार पेड़ों के होते हैं। सावन के मौमस में पहाड़ पर वे इन बीजों को घाटी में उस जगह फेंकते हैं जहां मिट्टी और नमी दिखाई देती है। अब तक वे 95 हजार बीज अलग-अलग पहाड़ों पर फेंक चुके हैं। इस मुहिम का असर ये है कि पहाड़ पर बारिश के सीजन में पनपा हुआ बीज सदियों तक हरियाली देता रहेगा। अजय की ये कोशिश छोटी लग सकती है लेकिन है बहुत बड़ी। बीज ले जाने का काम कभी चिड़ियाएं करतीं थी। चिड़ियाओं की संख्या चिंताजनक रूप से गिर रही है। ऐसे में पर्यावरण के चक्र को बनाए रखने में अजय की ये कोशिश छोटी नहीं कही जा सकती। पर्यावरण पर लंबे-लंबे भाषण देने से बेहतर है कि पर्यावरण की बेहतरी के लिए कोई एक अच्छी आदत अपना ली जाए। इनपुट सहयोग- अरविंद सिंह (जोधपुर), धर्म सिंह यादव (कोटपूतली)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

