मुगल शहजादी हुईं मारवाड़ के राजा की दीवानी:बेटियों का अपहरण हुआ तो बांधी काली पगड़ी, भास्कर उसी तालाब पर पहुंचा, पार्ट –1

मुगल शहजादी मारवाड़ के एक राजा की दीवानी हो गईं। 14वीं शताब्दी की इस घटना की गवाही आज भी यहां की धरती देती है। दैनिक भास्कर इस रोमांचक प्रेम कहानी को ढूंढने बाड़मेर से 100 किमी दूर सिणली गांव पहुंचा तो यहां मिला ‘गिंदोली तालाब’। यह वही तालाब है, जिसका नाम मुगल सुल्तान की शहजादी पर रखा गया। गणगौर और तीज का त्योहार नजदीक है। गिंदोली तालाब पर महिलाएं कुछ गीत गुनगुना रही थीं, जिसके बोल सुना रहे थे ये अनोखी कहानी। 4 एपिसोड की सीरीज में पढ़िए इतिहास के पन्नों से निकली एक ऐसी प्रेम गाथा, जिसने धर्म और सरहदों की सारी दीवारें तोड़ दीं… पूजा कर रही महिलाओं को उठा ले गई सुल्तान की सेना… बाड़मेर का मेवानगर सन 1340 में ‘महेवा’ कहलाता था। यहां संत और वीर रावल मल्लीनाथ जी का शासन था। उन्हीं के साहसी पुत्र थे- कुंवर जगमाल। गंभीर व्यक्तित्व, अचूक युद्ध रणनीति के माहिर और घुड़सवारी के शौकीन। हर कोई उनके पराक्रम का लोहा मानता था। ये वो दौर था जब मुगलों की सेना अक्सर मारवाड़ के राज्यों पर आक्रमण कर देती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। गणगौर के पर्व को लेकर महेवा के सिणली तालाब की पाल (किनारे) पर गांव की बेटियां (तीजणियां) तीज का व्रत रख पूजा-अर्चना कर रही थीं। तभी वहां से गुजरात के सुल्तान महमूद बेग का सेनापति जाफर खां अपनी फौज के साथ गुजरा। उसकी नजर इन लड़कियों पर पड़ी। उसने सैनिकों को लड़कियों का अपहरण करने का आदेश दे दिया। जाफरखां ने सख्ती से सैनिकों को आदेश दिया… इन सबको बंदी बनाओ ! उठा ले चलो इन्हें सुल्तान के पास, सुल्तान के हरम की रौनक बनेंगी ये खूबसूरत लड़कियां। जाफर खां के आदेश पर सैनिकों ने उन सभी तीजणियों का अपहरण कर लिया। उन्हें अहमदाबाद ले जाया गया और सुल्तान की बेटी शहजादी गिंदोली के महल में दासी बनाकर रख दिया गया। हरम की दीवारों के पीछे बेटियों का इंतजार महल में इन लड़कियों के लिए महल के झरोखों से बाहर देखना भी गुनाह था। वे दिन-रात शहजादी की सेवा करतीं, लेकिन मारवाड़ की बेटियों के दिलों में एक उम्मीद बनी हुई थी कि महेवा से कोई न कोई उन्हें बचाने जरूर आएगा। शहजादी की सेवा करते हुए वे अक्सर बातों-बातों में अपने देश के कुंवर जगमाल के शौर्य और बहादुरी के किस्से सुनती-सुनातीं थीं। एक दूसरे से कहती थीं भले ही आज हम इन दीवारों में कैद हैं, लेकिन हमारा भाई जगमाल हमें यहां मरने नहीं देगा। आंखों में आंसू लेकिन गर्व और उम्मीद लिए मारवाड़ की बेटियां आपस में बातें करतीं। ऐसे में अक्सर शहजादी गिंदोली के कानों में जगमाल का नाम पड़ता। जगमाल? कौन है यह जगमाल, जिसका नाम तुम लड़कियां दिन-रात लेती रहती हो? एक दिन शहजादी गिंदोली ने उत्सुकता से पूछ ही लिया। तब उन्होंने बताया… शहजादी ! हमारे कुंवर जगमाल वो शेर हैं, जिनकी तलवार जब म्यान से निकलती है, तो दुश्मन का कलेजा कांप जाता है। उनकी एक दहाड़ पर रेगिस्तान का जर्रा-जर्रा गूंज उठता है, लड़की ने मुस्कुराते हुए गिंदोली को बताया। दिन बीते, महीने बीते। मारवाड़ की बेटियों से जगमाल के शौर्य के किस्सों को शहजादी अब बड़े चाव से सुनने लगी। जगमाल के किस्सों के इसी सुनने-सुनाने के बीच शहजादी गिंदोली अनजाने ही उस अनदेखे वीर की कायल होने लगी थी। पिता ने अन्न जल त्याग दिया… उधर महेवा में, जब तीजणियों के अपहरण की खबर पहुंची, तो पूरे राज्य में मातम छा गया। रावल मल्लीनाथ गहरे दुख में डूब गए और उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया। पिता के दुख और राज्य के इस अपमान को देखकर कुंवर जगमाल का खून खौल उठा। और उन्होंने कहा… मारवाड़ की बेटियां मुगलों की दासी बनें यह जगमाल के जीते जी मुमकिन नहीं । यह सिर्फ उन बेटियों का नहीं, पूरे महेवा की साख का सवाल है… कुंवर जगमाल की आंखें अंगारे की तरह गुस्से से लाल थीं। जगमाल ने अपने सिर से पगड़ी उतार दी। काली पगड़ी बांधकर भरी सभा में एक कठोर शपथ ली। मैं, रावल मल्लीनाथ का पुत्र जगमाल। इस भरे दरबार में सौगंध खाता हूं कि जब तक मैं उन बहन-बेटियों को सुल्तान के चंगुल से छुड़ाकर सही-सलामत इस मिट्टी पर वापस नहीं लाता, तब तक न नए कपड़े पहनूंगा, और न ही अपनी दाढ़ी-मूंछ बनवाऊंगा! यह एक क्षत्रिय का वचन है। कुंवर जगमाल ने प्रतिज्ञा ले ली। प्रतिज्ञा तो कर ली थी, लेकिन आगे की राह आसान नहीं थी। एक तरफ गुजरात के सुल्तान की लाखों की फौज और मजबूत किला और दूसरी तरफ कुंवर जगमाल का अटूट निश्चय। दूसरे पार्ट में पढ़िए और देखिए, क्या कुंवर जगमाल सुल्तान के उस सुरक्षित किले को भेद पाएंगे? क्या वो अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर मेहवा की बेटियों को छुड़ा पाएंगे? साथ ही जानिए क्या हुआ शहजादी का… (कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। सोर्स: राजस्थानी साहित्य, लोक कथाएं व स्थानीय लोगों से बातचीत।) इनपुट सहयोग- अरविंद सिंह, मयंक अवस्थी
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