महेश जोशी की गिरफ्तारी को एसीबी कोर्ट ने माना सही:कहा-व्हाट्सएप कॉल से दी सूचना; पूर्व मंत्री ने लिखित सूचना नहीं देने पर गिरफ्तारी को बताया था अवैध

जल जीवन मिशन (जेजेएम) घोटाले में गिरफ्तार पूर्व मंत्री महेश जोशी की गिरफ्तारी को एसीबी कोर्ट ने वैध माना है। मंगलवार को एसीबी कोर्ट ने संख्या-2 ने महेश जोशी के उस प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होने परिजनों को लिखित सूचना नहीं देने पर अपनी गिरफ्तारी को अवैध करार देने की मांग की थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पूर्व मंत्री की गिरफ्तारी में संवैधानिक अधिकारों और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों की पूरी पालना की गई है। परिजनों को गिरफ्तारी के आधार और हालात की सूचना तकनीकी व मौखिक माध्यमों से समय पर मिल चुकी थी, इसलिए गिरफ्तारी को अवैधानिक नहीं माना जा सकता है। इस मामले में महेश जोशी के बेटे रोहित जोशी द्वारा लगाई गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर बुधवार को हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है। परिजनों को लिखित सूचना नहीं दी महेश जोशी के वकील ने कोर्ट में प्रार्थना पत्र पेश करके कहा कि 7 मई को जब उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में 5 दिन के पुलिस रिमांड के लिए पेश किया गया, तो नियमों की अनदेखी की गई। सुप्रीम कोर्ट के अनिवार्य दिशा-निर्देशों के तहत गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना और उसकी पावती परिजनों अथवा अधिवक्ता को रिमांड मांगने से पूर्व नहीं दी गई। लिखित सूचना के अभाव में यह गिरफ्तारी पूरी तरह गैर-कानूनी है, इसलिए उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। एसीबी ने कहा- व्हाट्सएप कॉल पर सूचना दी इसका विरोध करते हुए विशिष्ट लोक अभियोजक मंजूला जैन ने कहा कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भूपेन्द्र सिंह टीम के साथ पूर्व मंत्री के आवास पर आदेश लेकर पहुंचे, जहां उनके पुत्र रोहित जोशी, पुत्रवधू और बड़ी बहन मौजूद थीं। टीम ने अपना परिचय पत्र दिखाकर महेश जोशी को ब्यूरो मुख्यालय ले जाने की पूरी जानकारी दी। ब्यूरो मुख्यालय पर महेश जोशी को गिरफ्तार किया गया। इसकी सूचना सुबह सामान्य फोन कॉल और फिर रोहित जोशी के मोबाइल पर ‘व्हाट्सएप कॉल’ के जरिए दी गई। इसके बाद कोर्ट ले जाते समय और कोर्ट परिसर पहुंचने पर भी व्हाट्सएप कॉल से सूचना दी गई, जिसके स्क्रीनशॉट अदालत में पेश किए गए। कोर्ट ने कहा- रिमांड के समय वकील मौजूद थे जज राजेश कुमार दड़िया ने प्रार्थना पत्र को खारिज करते हुए कहा बीएनएसएस की धारा 48 का मुख्य उद्देश्य अभियुक्त के ‘बचाव करने के अधिकार’ को सुरक्षित करना है। इस मामले में जब कोर्ट में रिमांड पेश किया गया, तब आरोपी के वकील वहां पहले से मौजूद थे और उन्होंने रिमांड पर बहस भी की, जिससे सिद्ध होता है कि परिजनों को समय पर पूरी जानकारी थी।
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