आंखों पर पट्टी बंधी है, सामने मौजूद ट्रेनर अपने हाथों के मूवमेंट के बारे में बच्चों से पूछते हैं। बच्चे मुंह से बोलकर या उसी मुद्रा में खड़े होकर उन्हें जवाब बताते हैं। क्या बच्चे सच में बिना देखे हाथ में रखे कार्ड पर छपी आकृति बता सकते हैं? क्या सच में बच्चे बिना देखे रंगों को पहचान सकते हैं? किताबें पढ़ सकते हैं? शिविर के ट्रेनर का दावा है कि ये सब योग और मेडिटेशन से संभव है। पहले देखिए ये तस्वीर… ये तस्वीर है चित्तौड़गढ़ में आर्यवीर दल के 10 दिन चले आत्मरक्षा और चरित्र निर्माण शिविर की। यहां मौजूद ट्रेनर का दावा है कि बच्चे इस शिविर में अपनी सिक्स्थ सेन्स के जरिए बंद आंखों से भी किसी चीज के रंग को पहचान लेते हैं। सूंघ कर सामने खड़े व्यक्ति की शर्ट का कलर और हाथों का मूवमेंट बता देते हैं। योग और मेडिटेशन के जरिए क्राउन चक्र, थर्ड आई चक्र, थ्रोट चक्र, हार्ट चक्र, सोलर प्लेक्स चक्र और रूट चक्र को सक्रिय किया जा सकता है। इसके लिए बच्चों को वैदिक मानस योग भी करवाया जाता है। शिविर में इसे सिक्स सेंस डेवलपमेंट के रूप में भी समझाया जा रहा है। बोले- ये चमत्कार या जादू नहीं, अनुभव और प्रैक्टिस शिविर के ट्रेनर भारद्वाज रतन कहते हैं- 19 से 28 मई तक ये शिविर चित्तौड़गढ़ के श्री गुरुकुल में आयोजित हुआ था। इसमें राजस्थान के 22 जिलों से करीब 300 बच्चों ने हिस्सा लिया था। भारद्वाज रतन कहते हैं- यह किसी चमत्कार से जुड़ी चीज नहीं बल्कि अनुभव और अभ्यास की प्रक्रिया है। बच्चों को आंखें बंद करके कलर कार्ड, ड्राइंग और दूसरी एक्टिविटी करवाई जाती है। जब बच्चों को कोई कलर या कार्ड दिया जाता है तो वे उसे हाथों से रगड़ते हैं, उसकी स्मेल या आवाज को महसूस करते हैं। इसके बाद उसी एक्सपीरियंस को दोबारा उपयोग में लेकर रंग और हाथों के मूवमेंट पहचान लेते हैं। ब्रेन एक्सरसाइज और योगा से प्रैक्टिस भारद्वाज रतन कहते हैं- शरीर के अलग-अलग चक्रों का संबंध रंगों से माना जाता है। जब कोई रंग हाथ या स्मेल (सूंघने) के जरिए दिमाग तक पहुंचता है तो बच्चे उसे पहचानने की कोशिश करते हैं। इसके लिए बच्चों को नियमित योग, ब्रेन एक्सरसाइज और मेडिटेशन कराया जाता है। कुछ बच्चों में इसका असर जल्दी दिखने लगता है, जबकि कुछ को ज्यादा समय लगता है। चक्रों को जागृत करने का अभ्यास भारद्वाज कहते हैं- शुरुआत में बच्चों को योग कराया जाता है। इसके बाद दिमाग को शांत और कंट्रोल करने वाली ब्रेन एक्सरसाइज करवाई जाती हैं। फिर बच्चों को लंबे समय तक मेडिटेशन कराया जाता है। प्रशिक्षकों के अनुसार योग और मेडिटेशन को इस पूरे प्रशिक्षण में सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। योग और मेडिटेशन के जरिए क्राउन चक्र, थर्ड आई चक्र, थ्रोट चक्र, हार्ट चक्र, सोलर प्लेक्स चक्र और रूट चक्र को सक्रिय करने का अभ्यास कराया जाता है। इसके लिए बच्चों को वैदिक मानस योग भी करवाया जाता है। थर्ड आई की प्रैक्टिस करवाते हैं सार्वदेशिक आर्यवीर दल के प्रधान संचालक आचार्य नंद किशोर ने बताया- बच्चों की दिनचर्या सुबह 4 बजे शुरू होती है और रात तक अलग-अलग गतिविधियां चलती रहती हैं। योग, ध्यान, हवन, जूडो-कराटे, लाठी, भाला, लेजिम और डंबल अभ्यास के बीच सबसे ज्यादा आकर्षण तृतीय नेत्र विकास (थर्ड आई) प्रैक्टिस का रहता है। बच्चों को पहले मानसिक रूप से शांत और एकाग्र बनाना जरूरी होता है, इसलिए लंबे समय तक मेडिटेशन और ब्रेन एक्सरसाइज करवाई जाती है। इसके बाद धीरे-धीरे बच्चों को अलग-अलग संवेदनाओं को महसूस करने का अभ्यास कराया जाता है। अब पढ़िए पूरा प्रोसेस बच्चों ने बताया- नई चीजें सीखने को मिल रही हैं निंबाहेड़ा से आए भविष्य योगी ने बताया कि उन्हें यह अनुभव अच्छा लग रहा है। उन्होंने कहा कि जब वे आंखों पर पट्टी बांधते हैं तो शरीर में अलग सा महसूस होता है, जिसके आधार पर वे जवाब देते हैं। भविष्य ने बताया कि उन्होंने इसकी शुरुआत इसी कैंप से की है और अब वे इसे आगे भी सीखना चाहते हैं। वहीं केकड़ी से आए सौम्य शर्मा ने बताया कि जब मम्मी-पापा ने शिविर में जाने के बारे में पूछा तो उन्होंने तुरंत हां कर दी। वे पिछले पांच दिनों से शिविर में हैं। सौम्य ने बताया कि वे कलर और कार्ड को स्मेल, रगड़कर और महसूस करके पहचानने की कोशिश करते हैं। वे अक्षरों को सुनकर और महसूस करके पहचानने की कोशिश करते हैं। क्या है आर्यवीर दल

