सरकार ने निकाय-पंचायत चुनाव में OBC आरक्षण को सही ठहराया:हाईकोर्ट में कहा- आयोग ने डोर-टू-डोर सर्वे किया; कम आरक्षण देने को लेकर हुआ था विवाद

सरकार ने निकाय और पंचायत चुनाव में दिए गए ओबीसी आरक्षण को सही ठहराया है। हाईकोर्ट में पेश जवाब में सरकार ने कहा कि उसने ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर लॉटरी के जरिए चुनाव में ओबीसी आरक्षण दिया है। सरकार का जवाब ऐसे समय में आया है, जब प्रदेश में प्रधान, पंचायत समिति सदस्य, सरपंच और पंच के लिए लॉटरी निकाली जाना प्रस्तावित है। दरअसल, 13 अगस्त को जिला परिषद में जिला प्रमुख के पदों के लिए आरक्षण की लॉटरी निकाली गई थी, जिसमें 41 जिलों में से 5 पद ओबीसी के लिए आरक्षित हुए थे। उसके बाद ओबीसी आरक्षण कम दिए जाने को लेकर उठे विवाद व अन्य कारणों से सरकार ने आगे की लॉटरी को स्थगित कर दिया और 17 और 18 सितंबर को लॉटरी की तिथि तय की थी। लेकिन अब निकाय चुनावों का हवाला देते हुए इसे मंगलवार को एक बार फिर स्थगित कर दिया है। ओबीसी आयोग ने डोर-टू-डोर सर्वे किया सरकार ने अपने जवाब में कहा कि ओबीसी आयोग ने डोर-टू-डोर सर्वे करवाकर और जनाधार के उपलब्ध डेटा का एनालिसिस करके ही ओबीसी आरक्षण की सिफारिश की है। हमने सुप्रीम कोर्ट की 50 प्रतिशत की सीमा के अंदर ही एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण दिया है, इसलिए ओबीसी आरक्षण किसी भी सूरत में नहीं बढ़ाया जा सकता है। दरअसल, पंचायत चुनाव में जिला प्रमुख के पदों के मुकाबले ओबीसी की सीटें नहीं बढ़ने पर हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा था। राधेराम गोदारा ने कोर्ट में याचिका लगाकर कहा था कि सरकार ने जिला पुनर्गठन और नए जिलों के गठन के बाद जिला प्रमुख के कुल पदों की संख्या 33 से बढ़ाकर 41 कर दी है। इसके बावजूद पदों के अनुपात में अन्य पिछड़ा वर्ग को नियमानुसार और आनुपातिक आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया। जिला प्रमुख पदों पर ओबीसी आरक्षण को नहीं बढ़ाया जा सकता 13 अगस्त को जिला परिषद में जिला प्रमुख के पदों के लिए आरक्षण की लॉटरी निकाली गई थी, जिसमें 41 जिलों में से 5 पद ओबीसी के लिए आरक्षित हुए थे। जालोर, बूंदी, खैरथल-तिजारा जिला प्रमुख का पद ओबीसी के लिए आरक्षित हुआ है। वहीं, ब्यावर और सीकर के जिला प्रमुख पद महिला ओबीसी के लिए आरक्षित हुए हैं। इसके बाद हाईकोर्ट में राधेराम गोदारा ने याचिका दायर करके कहा था कि जब प्रदेश में जिला प्रमुख के कुल पद 33 थे, तब भी ओबीसी के लिए 5 सीट रिजर्व थी, लेकिन अब जब जिला प्रमुख के पद बढ़कर 41 हो गए है, तो भी ओबीसी के लिए 5 पद ही रिजर्व हुए हैं। ऐसे में समानुपात में पद बढ़ाने की मांग की गई है। प्रदेश में 8 जिला प्रमुख के पद एससी, 7 जिला प्रमुख पद एसटी और 5 पद ओबीसी के लिए आरक्षित किए गए हैं। इसके हिसाब से 41 में से 20 पद आरक्षित हुए हैं, जो 48.78% है। यह सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित 50 फीसदी आरक्षण की लिमिट के अंदर है, इसलिए किसी भी सूरत में जिला प्रमुख के पदों पर ओबीसी आरक्षण को नहीं बढ़ाया जा सकता है। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं याचिकाकर्ता के वकील आनंद शर्मा का कहना है कि अभी तक सरकार ने ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार खुद सरकार ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को पूरी तरह से सही नहीं मानती है। इसके बाद भी ओबीसी को 21 प्रतिशत की जगह मात्र 16 प्रतिशत आरक्षण ही क्यों दिया जा रहा है। जबकि साल 2020 में 18 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था। उस हिसाब से भी जिला प्रमुख में ओबीसी की सीटों की संख्या 7 होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमने सरकार के जवाब पर रिजॉइंडर पेश कर दिया है। अब संभवत अगले सप्ताह मामले की सुनवाई हो सकती है। कांग्रेस की सरकार को घेरने की तैयारी दूसरी ओर कांग्रेस लगातार ओबीसी को कम आरक्षण देने पर सरकार पर सवाल खड़े कर रही है। इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए कांग्रेस ने आरक्षण बचाओ प्रकोष्ठ का भी गठन किया है। कांग्रेस का कहना है कि पंचायतीराज और नगर निकाय चुनावों में आरक्षण के आंकड़ों के साथ मनमानी की गई और ओबीसी आरक्षण को घटाया गया है।
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