नमस्कार, सीकर में यूडीएच मंत्रीजी का पूरा परिवार चुनावी मैदान में कूद गया। निर्दलीय बेटे को लेकर सवाल उठा तो बोले-जनता जवाब देगी। अजमेर में फ्लाईओवर को लेकर केंद्रीय मंत्रीजी की ‘रगड़ाई’ हो गई। पंचायत चुनाव में कई जगह वोट बहिष्कार हुए, ऐसे में होमगार्ड्स की रीलें चर्चा में हैं और जयपुर में स्वाद लेते कलेक्शनमैन को 20 लाख का फटका लग गया। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. मंत्रीजी के बेटे की रील उनका नाम दुर्गा सिंह खर्रा है। उनके पिता प्रदेश में यूडीएच मंत्री हैं। उनकी माताजी फूल के सिंबल पर चुनावी मैदान में हैं। छोटा भाई भी फूल के सिंबल पर चुनाव लड़ रहा है। उनकी चाची और वे खुद निर्दलीय खड़े हैं। उनका कहना है कि पार्टी में लोगों का विश्वास नहीं रहा, इसलिए निर्दलीय लड़ रहा हूं। मंत्रीजी से इस बात को लेकर सवाल किया तो बोले- रिजल्ट आने पर बात करेंगे। कोई कुछ भी कह सकता है। जनता जवाब देगी तो खुद-ब-खुद पता चल जाएगा। पिता के मंत्री होने के बावजूद बड़े बेटे की रीलें यह संदेह पैदा करती हैं कि व्यक्ति खुद की पहचान के लिए छटपटा रहा है। वह किसी के साये में पहचान नहीं बनाना चाहता। रीलों की बानगी देखिए- पहचान खुद की होगी तो दुनिया कद्र करेगी, किसी के दांये बांये खड़े होने से किरदार ऊंचा नहीं होता। एक और- मुझे किसी का छीना हुआ, किसी के नसीब का न मिले तो अच्छा। मेरे ही नसीब का मिले, मेरी मेहनत का ही मिले। और पढ़िए- झूठे रिश्तों से बेहतर हैं अकेले ही रह जाना। शॉर्टकट काम नहीं आएगा, मेहनत ही रंग लाएगी। कई लोग कहने को अपने थे लेकिन हमारी तरक्की उनसे देखी नहीं गई। एक रील में यह प्रयोग भी है- जो बुरे वक्त में मेरे साथ खड़ा है, उसका बुरा वक्त कभी नहीं आने दूंगा। कुल मिलाकर मंत्रीजी का बेटा मंत्रीजी के ही नक्शेकदम पर है। उसे छत्रछाया में राजनीति नहीं करनी। बागी बनकर आगे बढ़ना है। यह भी राजनीति का ही एक अध्याय है। बाकी जैसा मंत्रीजी ने कहा- जनता जवाब देगी तो खुद-ब-खुद थाह पता चलेगी। 2. केंद्रीय मंत्रीजी की ‘रगड़ाई’ ये वही केंद्रीय मंत्रीजी हैं जो खेती करते हैं। खेती में सिंचाई के लिए तालाब की दरकार होती है। कृषि विभाग जरूरतमंद किसानों को सब्सिडी देता है। साहब ने 1 करोड़ की सब्सिडी उठा ली थी। शान से खेत में बोर्ड भी लगाया। बोर्ड पर निर्मल शब्दों में लिखवाया कि केंद्रीय कृषि विभाग ने सब्सिडी दी है। खबरें चलने लगीं कि मंत्रीजी ने अपने ही विभाग से अपने ही लिए सब्सिडी उठा ली। मान्यवर ने कहा था कि इसमें क्या गलत है? मैं भी किसान हूं। खैर, वे बातें आई-गई हो गईं। बताया जाता है कि मंत्रीजी ने बात को तूल न देते हुए सब्सिडी भी सरेंडर कर दी। अब ताजा बात सुनें। अजमेर का इलाका है किशनगढ़। यहां गांव है पाटन। पाटन में पंचायत के चुनाव हुए। दोपहर तक एक भी वोट नहीं पड़ा। जानकारी मिली कि गांव वालों ने चुनाव का बहिष्कार कर रखा है। निर्वाचन कर्मचारी मक्खियां मारते रहे। गांव वालों को समझाने रिटर्निंग अधिकारी गए। तहसीलदार गए। लेकिन हल नहीं निकला। गांव वाले बोले- हम इतने बरसों से पाटन चौराहे पर फ्लाईओवर की मांग कर रहे हैं, काम क्यों नहीं हो रहा? हमें तो नहीं डालना वोट। लोगों को समझाने का जिम्मा केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी जी ने उठाया। वे फ्लाईओवर के कागज लेकर मौके पर पहुंच गए। दावे करने लगे कि ये देखो, ये फ्लाईओवर की मंजूरी है। काम शुरू हो चुका है। वोट डाल दीजिए। कागज का फ्लाईओवर लोगों को समझ नहीं आया। वे उसे खारिज कर बाहर निकल गए और नारेबाजी करने लगे। राजा भागीरथ गंगा का पानी ले आए थे। भागीरथ चौधरी पानी के लिए सब्सिडी ले आए। अब फ्लाईओवर कहां से लाएं? फ्लाईओवर के लिए सब्सिडी तो मिलती नहीं। 3. होमगार्ड्स का ‘टाइमपास’ समझदार जनता चुनाव के वक्त रूठती है। नेताजी को खरी-खरी सुनाने का मुफीद वक्त भी यही होता है। चुनाव के सीजन में नेताजी याचक बन जाते हैं। इस बार पंचायत चुनाव में कई गांवों में लोग हिसाब-किताब के मूड में दिखे। बरसों से उनकी समस्याएं हल नहीं हो रहीं, तो क्या करें? झुंझुनूं के हंसास गांव के लोग वोट डालने नहीं गई। बोले- पूरा गांव ही मंदिर माफी की जमीन पर है। ऐसे में विकास के काम नहीं होते। बजट लौट जाता है। समस्या का समाधान होगा तब वोट डालेंगे। सिरोही के सिंगारली खेड़ा गांव के लोगों ने पंचायत पुनर्गठन का मुद्दा उठा दिया। वोट डालने निकले ही नहीं। दौसा के करणपुरा में भी यही हाल। यहां भी परिसीमन का मुद्दा। बोले हमारे गांव को जबरन पीपलखेड़ा में क्यों शामिल किया? हमें तो पाटोली में रहने देते। अब हम वोट नहीं डालेंगे। पाली के उमकली गांव के लोगों ने भी मौके पर चौका मारा। बोले-उमकली को अलग से ग्राम पंचायत बनाओ। बहिष्कार की बयार में कोटपूतली-बहरोड़ में पोलिंग पार्टी के सरकारी कर्मचारियों ने अपना अलग राग छेड़ दिया। बोले- हम उपवास रखकर ड्यूटी देंगे, चाय-पानी, नाश्ता-भोजन नहीं करेंगे। क्योंकि हमारे अवकाश, जीपीएफ, एसआई, ग्रेच्युटी और उपार्जित अवकाश, बकाया भुगतान…. इतने बहिष्कारों के बीच जोधपुर वाले होमगार्ड्स की रीलें चर्चा में हैं। खाली कमरों में ये गार्ड सिंघम और सूर्यवंशी पर जमकर अदाएं दिखा रहे हैं। 4. चलते-चलते.. पुलिस बार-बार कहती है- नजर हटी और दुर्घटना घटी। डॉक्टर भी कहते हैं- ज्यादा तला-भुना सेहत के लिए ठीक नहीं। कलेक्शन एजेंट साहब ने घूम-घूमकर पेमेंट की उगाही की। एक बैग में 20 लाख रुपए लेकर स्कूटी पर निकल पड़े। इतनी मेहनत के बाद कैश के साथ उन्हें शीघ्रातिशीघ्र सही ठिकाने पर पहुंचना चाहिए था। लेकिन पापी पेट ने मरवा दिया। एक जगह रुककर 20 रुपए की पेटीज खरीद ली। सॉस लगाकर इत्मीनान से खाने लगे। नोटों से भरा बैग पैरों में रख दिया। इसी वक्त वहां से बुरी दशा गुजरी। उसने देखा लक्ष्मी मैया पैरों में है। दशा ने बदमाशों का रूप धारण किया और पलक झपकते ही बैग ले उड़ी। कलेक्शन एजेंट पेटीज का दोना लिए-लिए पीछे भागे। फिर हल्ला मचाया- अरे मेरा बैग ले गए। अरे मेरा बैग। 20 रुपए की पेटीज के चक्कर में 20 पेटी पैसा खिसक गया। खैर, बदमाशों की खैर नहीं वे तो धरे ही जाएंगे। लेकिन सबक यह है कि पुलिस और डॉक्टर जो कुछ कहे, उसे हल्के में न लें। इनपुट सहयोग- सीकर (स्वप्निल सक्सेना), महेंद्र सैनी (जयपुर), रोहित पारीक (किशनगढ़, अजमेर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

